बच्चे कहां कहें अपने मन की बात?

शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत जरूरी है

मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा करना भविष्य में घातक सिद्ध हो सकता है

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्कूलों के लिए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण नीति के मसौदे पर समीक्षा बैठक के बाद जो जानकारी साझा की, उससे पता चलता है कि केंद्र सरकार विद्यार्थियों के बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रतिबद्ध है। यह एक ऐसा विषय है, जिस पर हमारे देश में खुलकर बात नहीं की गई। शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत जरूरी है। बच्चे स्कूली दिनों में कई मानसिक समस्याओं का सामना करते हैं, लेकिन उनके आस-पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जहां वे अपनी बात कह सकें। कई बच्चों को स्कूल का माहौल अच्छा नहीं लगता। उन्हें शिक्षकों से शिकायत रहती है, लेकिन उनके बारे में बोलने से डरते हैं। यह डर बाद में किसी मानसिक समस्या का रूप ले सकता है, जो उस व्यक्ति को जीवनभर परेशान करता है। एक युवती, जो आज खुद शिक्षिका हैं, अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए भावुक हो जाती हैं। जब वे एक मशहूर स्कूल की छात्रा थीं तो वहां एक शिक्षिका उनकी पिटाई करने के बहाने ढूंढ़ती रहती थीं। शिक्षिका उन्हें पूरी कक्षा के सामने अपमानित करती थीं और इस बात का पूरा ध्यान रखती थीं कि छात्रा का आत्मविश्वास तोड़ा जाए। वह युवती जो अपनी कक्षा की सबसे शांत छात्राओं में से एक थीं, उनकी शिक्षिका उन पर शरारत करने, पढ़ाई के दौरान बात करने, इधर-उधर देखने, ध्यान कहीं और होने का आरोप लगाकर दंडित करती थीं। वर्षों बाद जब किसी कार्यक्रम में दोनों की मुलाकात हुई तो वह युवती चाह कर भी उन्हें प्रणाम नहीं कर पाईं, क्योंकि मन में इतनी कड़वाहट भरी थी, जिसे अब तक नहीं भुला पाई हैं। पुरानी बातें जिस दिन उन्हें याद आ जाती हैं, उनका पूरा दिन खराब हो जाता है। वे आज तक नहीं समझ पाईं कि वह शिक्षिका उन्हें बेवजह क्यों पीटती थी? अगर उस समय स्कूल में कोई ऐसी व्यवस्था होती, जहां जाकर वे अपने मन की बात कहतीं और वहां से उचित परामर्श पातीं तो आज उनका मानसिक स्वास्थ्य बहुत अच्छा होता।

हर बच्चे की मानसिक स्थिति एक जैसी नहीं होती है। कुछ बच्चे बड़े भावुक और संवेदनशील होते हैं। वे कठोर बात बर्दाश्त नहीं कर पाते। पिछले साल राजस्थान के एक बड़े स्कूल का मामला बहुत चर्चा में रहा था। उसकी चौथी कक्षा की एक छात्रा ने छत से कूदकर जान दे दी थी। माता-पिता ने आरोप लगाए थे कि बच्ची को कई दिनों से परेशान किया जा रहा था। उसने शिक्षिका से मदद भी मांगी थी, लेकिन उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। बाद में, जब मीडिया ने उस मामले को प्रमुखता से उठाया तो स्कूल की मान्यता रद्द हुई, कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। अगर समय रहते इस ओर ध्यान दिया जाता तो वह घटना नहीं होती। मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा करना भविष्य में घातक सिद्ध हो सकता है। राजस्थान में एक प्रतिभाशाली छात्र को दुर्भाग्य से ऐसा माहौल मिला, जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी। उसके संयुक्त परिवार के कुछ सदस्य उसकी पढ़ाई-लिखाई के सख्त खिलाफ थे। जब वह स्कूल जाने के लिए घर से निकलता तो वे उसे कोई काम करने के लिए कह देते थे। जब वह यह कहते हुए इन्कार करता कि मुझे स्कूल जाने में देर हो रही है, तो वे उसे खरी-खोटी सुनाते थे। जब वह कक्षा में प्रथम आता तो वे उसका हौसला बढ़ाने के बजाय कहते- 'क्या फायदा है पढ़ाई-लिखाई का, जब तुम्हें भी एक दिन यहीं बेरोजगारों के साथ भटकना है?' एक दिन तो हद ही हो गई। परिवार में किसी वृद्ध व्यक्ति का निधन हो गया था। इस घटना के हफ्तेभर बाद उस लड़के की वार्षिक परीक्षा थी। जब वह परीक्षा के लिए निकला तो परिवार के एक बुजुर्ग सदस्य ने यह कहते हुए उसका रास्ता रोक लिया कि 'घर पर रहो, यहां काफी काम है ... परीक्षा तो हर साल आती है!' ये कड़वे अनुभव बाद में उसके लिए कई शारीरिक और मानसिक बीमारियों की वजह बने। बचपन खुशहाल होना चाहिए। उसके साथ ऐसी यादें जुड़ी हों, जो चेहरे पर हमेशा मुस्कान लाएं। जो बातें बच्चों के कोमल मन पर आघात करें, उन्हें परामर्श और सूझबूझ से दूर करना चाहिए। इसके लिए हर स्कूल में उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

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