दिल्ली के मालवीय नगर में स्थित एक होटल में भीषण आग लगने से 20 से ज्यादा लोगों की मौत होना अत्यंत दु:खद है। किसी ने नहीं सोचा होगा कि आग की लपटों में इस तरह इन्सानी जानें भस्म हो जाएंगी। हमारे देश में आए दिन ऐसे हादसे हो रहे हैं। कहीं आग लग जाती है, तो कहीं इमारत ढह जाती है। उनमें आम लोग मरते हैं। हादसे के बाद सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल होती हैं। जनता आक्रोश जताती है। कुछ अधिकारियों का निलंबन होता है। मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है। उसके बाद सबकुछ शांत! फिर किसी नए हादसे का इंतजार होता है। आखिर, ऐसा कब तक चलेगा? दिल्ली का जो होटल आग की चपेट में आया, वहां निर्माण संबंधी अनुमति को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। अगर किसी ने नियमों का उल्लंघन करते हुए ज्यादा मंजिलें बना दीं तो उस समय अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या वे तमाशबीन बने हुए थे? सवाल सिर्फ इस एक हादसे का नहीं है। जब भी कहीं आग लगती है, इमारत ढहती है तो यह बिंदु सामने आता है। अधिकारी समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं करते? वे उस समय कहां व्यस्त रहते हैं? अगर अधिकारी अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभाएं, नियम-विरुद्ध काम करने की अनुमति किसी स्थिति में न दें तो ऐसे हादसों को काफी हद तक टाला जा सकता है। सरकार भी ऐसे अधिकारियों को सिर्फ निलंबित करती है। यह कोई सजा नहीं है। बाद में, ये वापस बहाल हो जाते हैं। ऐसे मामलों में सख्ती से जांच होनी चाहिए। जो अधिकारी दोषी पाया जाए, उसे नौकरी से बर्खास्त करना चाहिए। उसकी संपत्ति की जांच होनी चाहिए। कोई अधिकारी इतना लापरवाह और भ्रष्ट है कि उसके कारण लोगों को जान गंवानी पड़ रही है तो उसके लिए उचित जगह दफ्तर नहीं, बल्कि जेल है।
कुछ दिन बाद जब मानसून अपनी पूरी ताकत के साथ आएगा तो कई इलाकों से हादसों की खबरें आएंगी। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा हर साल होता है। कहीं राह चलते लोग गड्ढे में गिर जाते हैं। कोई शख्स अपना परिवार पालने के लिए नौकरी करने जाता है, लेकिन बीच रास्ते में करंट के कारण जान गंवा बैठता है। कहीं आवारा पशु किसी वाहन से टकरा जाता है। कहीं सड़क इतनी खराब है कि वहां गिरने से कई लोगों के हाथ-पांव टूटते हैं। क्या हम पहले से अनुमान लगाकर इन हादसों को टालने के लिए उचित कदम नहीं उठा सकते? यह कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। कहां हादसे होते हैं, कहां कैसी समस्या है - अधिकारी इन बातों से अपरिचित नहीं हैं। उन्हें थोड़ी इच्छाशक्ति दिखानी होगी। आग लगने के बाद कार्रवाई करने से कहीं बेहतर है, आग लगने की आशंका को कम या खत्म कर दें। कई बार ऐसी खबरें आती हैं कि किसी इलाके में आग लगी तो दमकल बुलाई गई, लेकिन वाहन को आगे आने में परेशानी हुई, क्योंकि रास्ता ही नहीं था। अधिकारी आंखें मूंदे रहे और लोग अतिक्रमण करते रहे। जो रास्ता कभी वाहनों के लिए छोड़ा गया था, उस पर इतनी दीवारें खड़ी कर दी गईं कि अब राहगीर सही-सलामत निकल जाए, यही काफी है। कई दुकानदार अपनी दुकान के आगे सामान की नुमाइश लगाते हैं। वे उसे इतनी आगे बढ़ा देते हैं कि रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। इससे वाहनों के निकलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं बचती। कई बार लड़ाई-झगड़े होते हैं, लेकिन हालात नहीं बदलते। प्रशासन अतिक्रमण हटाने के नाम पर कोई अभियान चलाता है तो कुछ दिन नुमाइश नहीं लगती। उसके बाद वही ढाक के तीन पात! इस तरह हादसे नहीं रुकेंगे, बल्कि बढ़ते जाएंगे। इन्हें रोकने के लिए अधिकारियों को नियमों का सख्ती से पालन कराना होगा। इस काम में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करें और लोगों की जान बचाएं।