सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बाद बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई करने की जो दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाई है, वह कम ही राजनेता दिखा पाते हैं। अगर ऐसी कार्रवाई हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में होने लगे तो ये लोग भारत में घुसपैठ करने से पहले हजार बार सोचें। हकीमपुर सीमा चौकी पर जिस तरह बांग्लादेशियों का जमावड़ा लगा, उसे देखकर हैरानी होती है। ये इतने वर्षों तक भारत के संसाधनों का उपभोग करते रहे! तृणकां सरकार सबकुछ देखकर भी अनजान बनी रही। बीएसएफ को बाड़ लगाने के लिए जमीन देने और घुसपैठियों को निकाल भगाने की कार्रवाई का आदेश देने में जितना समय सुवेंदु अधिकारी को लगा है, उतना ही ममता बनर्जी को लगता। अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो आज प. बंगाल की तस्वीर कुछ और होती। तृणकां ने वोटबैंक के लालच में राष्ट्रीय हितों की घोर अनदेखी की। उसने देश की सुरक्षा से खिलवाड़ किया। भारतीय नागरिकों के अधिकारों पर अवैध बांग्लादेशियों को डाका डालने दिया। इन बांग्लादेशियों ने अब तक हमारे कितने लोगों के हिस्से का राशन डकारा होगा, कितनों का रोजगार छीना होगा? अगर इस हिसाब-किताब में जुटेंगे तो आंकड़ा करोड़ों में नहीं, अरबों-खरबों में जाएगा। ध्यान रहे, अभी कुछ ही बांग्लादेशी दिखाई दे रहे हैं। जिस दिन सख्ती बढ़ेगी, इनके बड़े-बड़े झुंड प्रकट होंगे और ढाका की राह पकड़ेंगे। इन्हें किसी कीमत पर यहां रहने नहीं दिया जाए। जब अलग देश मिल गया तो यहां रहने-कमाने और राजनीति को प्रभावित करने का मोह छोड़ना होगा। जिसे किसी काम से आना है, वह भारत सरकार से अनुमति लेकर आए, जैसे अन्य लोग कानूनी तरीके से आते हैं।
बांग्लादेशी घुसपैठियों के अच्छे दिन पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के जमाने से ही आने लगे थे। सीपीआई (एम) के लगभग साढ़े तीन दशक लंबे शासन में ये सरहद पार कर इधर आते रहे और पश्चिम बंगाल में अपने ठिकाने बनाते रहे। कई घुसपैठिए बढ़िया कमाई के लिए अन्य राज्यों में चले गए। कभी ममता बनर्जी इनका विरोध करती थीं। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर चर्चा की मांग करते हुए लोकसभा में कागज़ तक फेंक डाले थे। जब खुद सत्ता में आईं तो इस मुद्दे को भूल गईं! तब उन्हें घुसपैठियों में वोटबैंक दिखाई देने लगा था। अब हालात बदल रहे हैं। सुवेंदु अधिकारी के इन शब्दों को सुनकर घुसपैठियों में बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक है, 'हमने पुलिस को पहले ही कह दिया है कि उन्हें जेल न भेजें। उनके खाने-पीने और दवाइयों पर खर्च करने का कोई मतलब नहीं है। क्या वे हमारे ... हैं? ... जल्दी-जल्दी भागो, नहीं तो जो करना है, सरकार करेगी।' बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने के काम में तेजी लानी चाहिए। अभी जो यह सोचकर अन्य इलाकों में छिपे हुए हैं कि 'हम पकड़े नहीं जाएंगे और कोई कार्रवाई नहीं होगी', उन्हें चिह्नित कर प्रशासन द्वारा कठोर चेतावनी दी जानी चाहिए। साथ ही, जिन घुसपैठियों के पास आधार कार्ड, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और अन्य भारतीय दस्तावेज हैं, उनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिए, 'आपके पास ये कहां से आए? किन लोगों ने दस्तावेज बनाने में मदद की?' घुसपैठियों से भी ज्यादा खतरनाक लोग वे हैं, जो फर्जी दस्तावेज बनाने में उनकी मदद करते हैं। वे चंद रुपयों के लिए भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सुवेंदु अधिकारी 'हिसाब' करने की बात कहते हैं। सबसे पहले उन लोगों का हिसाब होना चाहिए, जिनकी वजह से बांग्लादेशी घुसपैठिए फर्जी दस्तावेज बनाकर यहां मौज करते रहे। उन्हें विश्वास था कि भारत में ये लोग रुपए लेकर अपने ही देश के खिलाफ काम करने के लिए तैयार हो जाएंगे। तृणकां सरकार ने तो वैसे ही आंखें मूंद रखी थीं। जब इतनी सहूलियत होगी तो घुसपैठिए क्यों नहीं आएंगे? जो घुसपैठिए अभी बांग्लादेश न जाएं, उन्हें भविष्य में कठोर दंड देकर निकाला जाए। जब सबको पता चलेगा कि भारत में अवैध ढंग से कदम रखना बहुत महंगा पड़ेगा तो कोई घुसपैठिया इधर आने का दुस्साहस नहीं करेगा।