गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग तेज हो रही है। प्रमुख मुस्लिम संगठन भी इसका समर्थन कर रहे हैं, जो सुखद है। हिंदू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है। इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। अगर केंद्र सरकार इस संबंध में कोई कानून बनाएगी तो देश के कोने-कोने से उसका समर्थन किया जाएगा। हालांकि एक बड़ा सवाल है- क्या इससे गौमाता की दशा वास्तव में सुधर जाएगी? आज गांवों से लेकर शहरों तक गौवंश की दुर्दशा हो रही है। गाय और बछड़े अक्सर कचरे में भोजन ढूंढ़ते और प्लास्टिक की थैलियां खाते नजर आते हैं। क्या गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिल जाने के बाद इनके अच्छे दिन आ जाएंगे? ऐसा कोई कानून बनेगा या नहीं बनेगा - यह भविष्य में पता चलेगा। गौवंश के संरक्षण के लिए कानून जरूरी है, लेकिन इससे संपूर्ण संरक्षण सुनिश्चित नहीं होगा। जब तक समाज आगे नहीं आएगा, गौवंश की हालत में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। कई पशुपालक गाय को तब तक घास-चारा और पौष्टिक चीजें खिलाते हैं, उसकी देखभाल करते हैं, जब तक वह दूध देती है। जब वह बूढ़ी हो जाती है, दूध देना बंद कर देती है तो उसे दर-दर भटकने के लिए छोड़ देते हैं। बछड़ों की हालत और ज्यादा बुरी है। क्या यह क्रूरता नहीं है? वहीं, कुछ पशुपालक अपनी गाय को उसकी अंतिम सांस तक घर में रखते हैं। उसकी खूब सेवा करते हैं। हर विशेष अवसर पर उसका पूजन करते हैं। जब गाय दूध देने में असमर्थ हो जाती है तो वे उसे भटकने के लिए नहीं छोड़ते। ऐसे दयालु हैं कितने? गायों की हालत के लिए समाज भी कम जिम्मेदार नहीं है। लोग व्रत-श्राद्ध आदि पर गाय ढूंढ़ते हैं। उसे भोजन खिलाने और आशीर्वाद लेने के बाद ही अपना काम करते हैं। बाकी दिनों में कितने लोग उसकी परवाह करते हैं? जब दूध खरीदने की बात आती है तो ज्यादातर लोग भैंस का दूध अधिक मूल्य पर खरीदने को तैयार हो जाते हैं। गाय का दूध सस्ता खरीदना चाहते हैं। वह सिर्फ बीमारी में याद आता है।
क्या हम रोजाना गाय का दूध नहीं ले सकते? भले ही कम मात्रा में लें, लेकिन हर परिवार गाय का दूध खरीदे तो इससे गौवंश की मुश्किलें कम हो सकती हैं। कई गौशालाएं अच्छा काम कर रही हैं। वहां जन्मदिन, मकर संक्रांति, पुण्य तिथि और अन्य अवसरों पर दान देकर गौसेवा कर सकते हैं। गौशालाओं को ऐसे तरीके ढूंढ़ने होंगे, जो ज्यादा से ज्यादा गौवंश का संरक्षण करने में सहायक हों। उदाहरण के लिए- गाय के गोबर से दीपक और सुगंधित अगरबत्ती बनाकर वाजिब दाम पर बिक्री के लिए उपलब्ध करा सकते हैं। गौवंश के मूत्र से बहुत अच्छी गुणवत्ता का कीटनाशक बनाया जा सकता है, जो पेड़-पौधों के लिए लाभदायक होता है। साथ ही, यह धरती की उर्वरता बढ़ाता है। गौशाला में काफी मात्रा में गोबर इकट्ठा होता है। किसान इसे खेतों में डालने के लिए खरीदते हैं। जब मांग कम होती है तो गोबर का ढेर लग जाता है। इससे कई समस्याएं पैदा होती हैं। गौशालाओं को चाहिए कि वे गोबर बेचने के बजाय उससे केंचुआ खाद बनाएं। अच्छी गुणवत्ता के केंचुए लाएं और लोगों को बेहतर खाद उपलब्ध कराएं। केंचुआ खाद में सामान्य गोबर की खाद से ज्यादा पोषक तत्त्व होते हैं। किसानों को यह बात समझानी होगी कि केंचुआ खाद की कीमत गोबर से ज्यादा जरूर है, लेकिन यह आपके खेत को वर्षों तक फायदा देगी। लंबी अवधि के आधार पर गणना करें तो केंचुआ खाद सस्ती पड़ती है। यह धरती के सूक्ष्म जीवों को नष्ट नहीं करती, बल्कि उनके लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करती है। शहरों में जो लोग अपने घरों में बगीचे लगाते हैं, वे भी केंचुआ खाद का उपयोग कर सकते हैं। गौवंश में अनेक दिव्य गुण हैं। वे अपने भोजन और दवाइयों के लिए खर्च खुद निकाल सकते हैं। अगर गौसेवा आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण हो तो किसी गौवंश को भटकना न पड़े।