डिजिटल अरेस्ट: जिंदगीभर की बचत पर डाका

लोगों को भी जागरूक होना पड़ेगा

अगले शिकार आप न हों, इसके लिए खुद जागरूक रहें

कर्नाटक राज्य साइबर कमांड ने 'डिजिटल अरेस्ट' एवं 24 करोड़ रुपए की ठगी के मामले में छह आरोपियों को गिरफ्तार कर सराहनीय कार्य किया है। इन लोगों ने खुद को सीबीआई और ईडी का अधिकारी बताते हुए एक बुजुर्ग महिला से बहुत बड़ी ठगी की थी। देश में डिजिटल अरेस्ट के मामलों में खास उतार-चढ़ाव भी देखने को मिल रहा है। कभी ये मामले बहुत पढ़ने-सुनने को मिलते हैं। उसके बाद कुछ दिनों के लिए 'शांति' छा जाती है। फिर ये दोबारा तहलका मचाने लगते हैं। संभवत: एजेंसियों की कार्रवाई से एक बार इनका धंधा मंदा पड़ जाता है। इस दौरान ये उसकी काट ढूंढ़ लेते हैं। उसके बाद दोबारा मैदान में उतरते हैं और लोगों को लूटना शुरू कर देते हैं। डिजिटल अरेस्ट जैसी गतिविधियों में कई देशों के ठग शामिल हैं। उनके नेटवर्क को नष्ट करना इतना आसान नहीं है। एजेंसियां अपना काम करेंगी, लेकिन लोगों को भी जागरूक होना पड़ेगा। याद रखिए, हमारे कानून में डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई प्रावधान नहीं है। सोचिए, अगर कोई व्यक्ति इतना खूंखार अपराधी है, जिसकी वजह से सीबीआई, ईडी, रॉ से लेकर तमाम जांच एजेंसियों और पुलिस अधिकारियों की नींदें उड़ी हुई हैं, क्या उसे सिर्फ डिजिटल अरेस्ट किया जाएगा? ऐसे खतरनाक व्यक्ति की भनक लगते ही उसे तुरंत गिरफ्तार किया जाता है। उसके बाद अदालत में पेश किया जाता है। अदालत के आदेश के बाद सख्ती से पूछताछ होती है। बड़े-बड़े लोगों को यह सामान्य जानकारी नहीं है, इसलिए जैसे ही उनके पास डिजिटल अरेस्ट संबंधी फोन आता है, वे डर जाते हैं और साइबर ठगों द्वारा दिए गए 'निर्देशों' का पालन करने लगते हैं। जब किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया ही नहीं है तो उसे डरने की जरूरत नहीं है। साइबर ठग इस डर का फायदा उठाते हैं। वे लोगों की जिंदगीभर की बचत एक झटके में उड़ा लेते हैं।

नागपुर में एक 72 वर्षीया सेवानिवृत्त नर्स को साइबर अपराधियों ने कई हफ्तों तक डिजिटल अरेस्ट रखा। आखिर में उनसे 90.65 लाख रुपए ठग लिए। नर्स ने अपने सेवाकाल में हजारों मरीजों की देखभाल की, उन्हें स्वस्थ किया। अब अपनी बचत के सहारे वृद्धावस्था गुजार रही थीं। अगर वे रोजाना 15 मिनट भी अखबार पढ़तीं तो डिजिटल अरेस्ट के जाल में नहीं फंसतीं। वे हफ्तों डिजिटल अरेस्ट रहीं, लेकिन उन्हें एक बार भी साइबर अपराधियों पर शक नहीं हुआ! ये ठग एक खास पैंतरा आजमाते हैं। सबसे पहले सामान्य ढंग से बातचीत करते हैं। जब व्यक्ति को यह 'विश्वास' हो जाता है कि यह वास्तव में कोई सरकारी अधिकारी है, तब एक-एक कर ऐसी बातें सामने लाते हैं, जिससे डर का माहौल बने। वीडियो कॉल पर, उसकी बात पुलिस की वर्दी पहने एक व्यक्ति से कराई जाती है, जो ठगों का साथी होता है। चूंकि हमारे देश में पुलिस को देखकर शरीफ लोग वैसे ही डर जाते हैं, इसलिए सवाल पूछने की हिम्मत नहीं करते। वे यही सोचते हैं कि किसी तरह इस आफत से बाहर निकलें। जब साइबर ठग देख लेते हैं कि यह व्यक्ति पूरी तरह डरा हुआ है, तब वे एक और दांव चलते हैं। वे कहते हैं, 'आप तो अच्छे घर के लगते हैं ... भले आदमी मालूम होते हैं ... हम जानते हैं कि आप ऐसे नहीं हैं ... हमें भी पता है कि आप बेकसूर हैं...।' ये शब्द सुनते ही उस व्यक्ति को उम्मीद की किरण दिखाई देती है। उसे लगता है कि अब यह मुसीबत दूर हो सकती है, क्योंकि 'अधिकारी' को मेरी बातों पर विश्वास हो रहा है। उसके बाद वह ठगों के बैंक खातों में रुपए ट्रांसफर कर देता है। जब तक उसे हकीकत मालूम होती है, साइबर ठग किसी दूसरे शिकार की तलाश में निकल पड़ते हैं। अगले शिकार आप न हों, इसके लिए खुद जागरूक रहें और दूसरों को भी जागरूक करें। अखबार के माध्यम से रोजाना अपनी जानकारी में किया गया छोटा-सा निवेश आपकी जिंदगीभर की बचत को सुरक्षित रख सकता है।

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