नई दिल्ली/दक्षिण भारत। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा है कि धर्मांतरण देश के लिए एक बड़ा खतरा है और इसने आदिवासी क्षेत्रों को गहराई से प्रभावित किया है, जिससे 'गंभीर सामाजिक संघर्ष और विभाजन' पैदा हुए हैं। उन्होंने इस खतरे को रोकने के लिए संवैधानिक संशोधन की मांग की है।
एक खास इंटरव्यू में सत्येंद्र सिंह ने कहा कि 'धर्म-परिवर्तन से जुड़ीं कई समस्याओं' का हल संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन करने में है। इसके तहत, अनुसूचित जनजाति श्रेणी के तहत मिलने वाले लाभ उन लोगों को नहीं दिए जाएंगे जो हिंदू धर्म से ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लेते हैं। यह संशोधन अनुच्छेद 341 की तर्ज पर होगा, जिसमें अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए ऐसे ही प्रावधान हैं, जो दूसरे धर्म अपना लेते हैं।
सत्येंद्र सिंह ने कहा कि जहां एक ओर आरएसएस से जुड़ा संगठन 'वनवासी कल्याण आश्रम' मुख्य रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक जागरूकता जैसे क्षेत्रों में काम करता है, वहीं इसने साल 2006 में रायपुर में 'जनजाति सुरक्षा मंच' की स्थापना की, ताकि उन एसटी समुदायों के सदस्यों को 'सूची से हटाने' (डिलिस्टिंग) के मुद्दे को आगे बढ़ाया जा सके, जिन्होंने इस्लाम, ईसाई धर्म या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपना लिया है।
उन्होंने दावा किया कि आदिवासी समुदाय के एक बड़े हिस्से का धर्मांतरण हो चुका है, और साथ ही यह भी कहा कि जहां कहीं भी धर्मांतरण हुआ, वहाँ 'अलगाव' की एक गहरी भावना उभर आई।
उन्होंने कहा, 'हमारे अपने लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे से कटते चले गए। समाज के भीतर ही आपसी टकराव और बंटवारा शुरू हो गया। एक भाई ईसाई बन गया, तो दूसरा हिंदू ही बना रहा; और इस वजह से परिवारों और समुदायों के बीच दरारें पड़ गईं।'
वनवासी कल्याण आश्रम के संस्थापक बालासाहेब देशपांडे का ज़िक्र करते हुए सत्येंद्र सिंह ने कहा, 'उन्होंने अपने अंतिम दिनों में कहा था कि जहां हम लोगों की सेवा में लगे हुए हैं, वहीं आने वाला समय संघर्ष का दौर भी होगा। इसलिए, हमें उस नज़रिए से भी कार्यकर्ताओं को तैयार करने की ज़रूरत होगी।'
सत्येंद्र सिंह ने यह भी स्वीकार किया कि हिंदू समाज के भीतर सामाजिक भेदभाव और जातिगत विभाजन ने धर्मांतरण में योगदान दिया है।
उन्होंने कहा, 'धर्मांतरण के पीछे कई कारण हो सकते हैं। हमारे अपने समाज में भी कुछ कमियां थीं। लोगों को और अधिक स्नेह तथा अपनापन मिलना चाहिए था।'
उन्होंने आरोप लगाया कि ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और कल्याण कार्यों की आड़ में मिशनरी गतिविधियां बढ़ीं, और दावा किया कि ईसाई मिशनरियों द्वारा दिए गए 'प्रलोभनों' ने भी धर्मांतरण में भूमिका निभाई।