आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने राज्य में जन्म दर को बढ़ावा देने के लिए तीसरे और चौथे बच्चे के जन्म पर प्रोत्साहन राशि (क्रमश: 30,000 रुपए और 40,000 रुपए) दिए जाने के संबंध में जो घोषणा की है, उससे एक नई बहस शुरू हो गई है। इस घोषणा से कई सवाल भी पैदा होते हैं। अब तक यह पढ़ने-सुनने को मिलता था कि 'भारत में जनसंख्या बहुत बढ़ गई है, इसलिए किसी तरह इस पर काबू पाएं।' वहीं, आंध्र प्रदेश में अलग ही तस्वीर दिखाई दे रही है। यहां सरकार संतान पैदा करने पर रुपए देगी! पहला सवाल तो यही पैदा होता है कि क्या आंध्र प्रदेश में सच में ऐसी स्थिति आ गई है, जिसके कारण सरकार को आर्थिक प्रोत्साहन की घोषणा करनी पड़ी? जापान, सिंगापुर, स्वीडन, दक्षिण कोरिया जैसे देशों में जन्म दर में भारी गिरावट आने के कारण उनकी सरकारें आर्थिक सहायता कार्यक्रम चला रही हैं, लेकिन ये बहुत समृद्ध देश हैं। वहां नागरिकों को शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन आदि के लिए गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। भारत में इन सुविधाओं पर पहले ही काफी दबाव है। ऐसे में और ज्यादा संतानोत्पत्ति को प्रोत्साहन देने का क्या औचित्य है? क्या जो बच्चे जन्म लेंगे, उनके लिए अच्छे सरकारी स्कूल हैं? क्या सरकारी अस्पताल वर्तमान जनसंख्या को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं दे पा रहे हैं? क्या सार्वजनिक परिवहन सेवाएं इतनी बेहतर हो गई हैं कि वे और ज्यादा जनसंख्या का बोझ बर्दाश्त कर सकें? क्या रोजगार देने के लिए सरकार के पास कोई ठोस योजना है? क्या उन बच्चों के लिए साफ पानी, साफ हवा और शुद्ध भोजन है? अगर कोई राज्य सरकार अपने यहां घटती जन्म दर को लेकर सच में चिंतित है तो पहले इन सवालों पर ध्यान दे।
जो लोग इस धरती पर आ चुके हैं, उन्हें मूलभूत सुविधाएं जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। महंगाई ने कई परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है। ऐसे माहौल में कोई दंपति दो बच्चे पाल ले, वही आज बहुत बड़ी बात है। अब कई शहरों में डिंक (डबल इनकम, नो किड्स) का चलन बढ़ता जा रहा है। उन दंपतियों ने यह फैसला रातोंरात नहीं लिया है। राज्य सरकारें अच्छे स्कूल, अस्पताल, आवास और रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं दे पाईं, इसलिए वे उनके भरोसे किसी बच्चे को दुनिया में नहीं लाना चाहते। सरकारों को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। सिर्फ कुछ हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि घोषित कर देने मात्र से कितने लोग इसे गंभीरता से लेंगे? इतनी राशि से तो एक अच्छे स्कूल में पहली कक्षा की फीस नहीं भरी जा सकती। उस बच्चे को पाल-पोसकर बड़ा करने, उसे किसी रोजगार लायक बनाने में बहुत रुपए खर्च होंगे। सरकारें सबसे पहले शिक्षा की ओर ध्यान दें। सरकारी स्कूलों की हालत सुधार दें। इसके साथ ही सरकारी अस्पतालों में जनसंख्या के अनुपात में सुविधाएं बढ़ा दें। ये दो काम पूरी ईमानदारी से हो जाएं तो लोगों के सिर से भारी बोझ हट जाए। इसके बाद स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव करना होगा। बच्चों को वह सिखाएं, जो उनके जीवन में काम आए। पांचवीं कक्षा के बाद रोजगार संबंधी जानकारी देना शुरू कर दें। दसवीं कक्षा पास करते-करते हर बच्चे में कामकाज संबंधी समझ पैदा हो जाए। जब वह कॉलेज में पहुंचे तो उसके पास कम-से-कम तीन ऐसे हुनर हों, जिनके जरिए वह अपनी रोटी खुद कमा सके। देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने से कहीं ज्यादा आसान होना चाहिए- स्वरोजगार शुरू करना और उसे आगे बढ़ाना। सरकारें बुनियादी ढांचे को इतना मजबूत बना दें कि किसी को पढ़ाई, दवाई और कमाई की चिंता ही न करनी पड़े। इससे जन्म दर को संतुलित और स्थिर रखने में मदद मिलेगी। संतानोत्पत्ति के मामले में शिक्षित वर्ग लोकलुभावन प्रयोगों पर विश्वास नहीं करेगा।