पश्चिम एशिया में संघर्ष की वजह से उपजे हालात को ध्यान में रखते हुए विदेशी मुद्रा की बचत करना बहुत जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस संबंध में देशवासियों से आह्वान किया और एक आदर्श स्थापित करने के लिए अपने काफिले की गाड़ियों की संख्या में भी कटौती कर दी। उनके बाद कई मुख्यमंत्रियों और राजनेताओं ने गाड़ियों की संख्या घटाई है। इससे जनता में मितव्ययता का संदेश गया है। हमें इसके दूसरे पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए। ईंधन की खपत कम करना स्वागत-योग्य है, लेकिन इससे प्रधानमंत्री की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री के काफिले से कुछ गाड़ियां हटा भी देंगे तो इससे ईंधन की कोई महाबचत नहीं हो जाएगी। हां, यह कदम अनजाने में उनकी सुरक्षा के चक्र को कमजोर जरूर कर सकता है। भारत पूर्व में अपने दो प्रधानमंत्रियों को सुरक्षा संबंधी चूक के कारण खो चुका है। क्या इसके बावजूद प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़ा कोई जोखिम लेना चाहिए? ईंधन की खपत कम करने के कई तरीके हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के वे राजनेता जिनकी सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है, वे आगे आएं और अपने काफिले को सीमित करें। राज्य स्तर के सभी नेतागण ऐसी पहल करें। और कर भी रहे हैं। उधर सरकारी अधिकारी और कर्मचारी भी इस आह्वान को दैनंदिन जीवन में उतारकर सकारात्मक संदेश दें। इससे प्रेरणा लेकर आम जनता ईंधन की खपत कम करेगी। इस समय ईंधन बचाना एक सामूहिक जिम्मेदारी है। समस्त देशवासियों को दृढ़ संकल्प के साथ यह निभानी होगी। आज प्रधानमंत्री से लेकर दूर-दराज के किसान तक मितव्ययता के इस महायज्ञ में अपना योगदान दे रहे हैं।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्राचीन काल में यज्ञ में विघ्न डालने के लिए आसुरी शक्तियां सिर उठाती थीं। वे सुरक्षा में सेंध लगाकर यज्ञ को भंग कर देती थीं। यज्ञ जरूरी है। उसके साथ यज्ञकर्ताओं की सुरक्षा भी जरूरी है। कहीं प्रधानमंत्री के काफिले को छोटा करवाने के पीछे कोई गहरी साजिश तो नहीं है? आईएसआई और सीआईए जैसी कुख्यात खुफिया एजेंसियां भारतीय प्रधानमंत्री के हर दौरे पर नजर रखती हैं। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिज़्बुल मुजाहिदीन, जमात-उद-दावा जैसे आतंकवादी संगठन तो सुरक्षा में कमी का फायदा उठाकर हर कहीं धमाके करने के लिए तैयार रहते हैं। याद करें, पिछले साल लाल किले के पास कार धमाका मामले में कई डॉक्टर पकड़े गए थे। पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। भारतीय सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों ने बड़े बलिदान देकर देश में शांति एवं सुरक्षा की स्थिति मजबूत की है। अगर ईंधन बचाने के नाम पर प्रधानमंत्री की सुरक्षा में कमी की गई तो यह उन बलिदानों पर पानी फेरने जैसी कोशिश हो सकती है। इस फैसले पर पुनर्विचार होना चाहिए। सोशल मीडिया पर इसका विरोध होना चाहिए। प्रधानमंत्री की सुरक्षा किसी सूरत में कम नहीं होनी चाहिए। उनके अलावा केंद्रीय गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री और विदेश मंत्री की सुरक्षा से भी कोई खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। देश के शीर्षस्थ एवं अत्यंत महत्त्वपूर्ण राजनेताओं के काफिले की गाड़ियां ईंधन की जितनी खपत करती हैं, वह देश में होने वाली कुल ईंधन खपत का एक प्रतिशत भी नहीं है। अगर इन गाड़ियों की संख्या में कटौती कर दें तो देश के कुल ईंधन खर्च के सामने वह राशि नगण्य होगी। इससे सुरक्षा का गंभीर संकट जरूर पैदा हो सकता है। भारत के दुश्मनों को कामयाब होने के लिए सिर्फ एक मौके की तलाश होती है। ईंधन बचाने की कोशिश में उन्हें ऐसा मौका हर्गिज नहीं देना चाहिए।