चीन फिर हुआ बेनकाब

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय मिसाइलें अजेय साबित हुईं

चीन अपने हथियारों के लिए नया बाजार खोजना चाहता है

चीन द्वारा पहली बार की गई इस बात की पुष्टि कि उसने पिछले साल भारत-पाक संघर्ष के दौरान पाकिस्तान को रण क्षेत्र में तकनीकी सहायता प्रदान की थी, भारत के खिलाफ दुश्मनी की खुली घोषणा है। चीन के आधिकारिक मीडिया पर यह खबर यूं ही नहीं आई है। इसके पीछे चीनी सरकार की खास रणनीति है। वह एक ओर तो पाकिस्तान को यह संदेश देना चाहती है कि उसे अकेला नहीं छोड़ेगी, दूसरी ओर भारत से यह कहना चाहती है कि बीजिंग अप्रत्यक्ष रूप से दिल्ली के खिलाफ लड़ाई में भागीदार है। पाकिस्तान चीनी तकनीक के दम पर कितनी ही डींगें हांक ले, दुनिया देख चुकी है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय मिसाइलें अजेय साबित हुईं। चीनी तकनीक न तो आतंकवादियों को बचा सकी, न पाकिस्तान एवं पीओके में हुई भारी तबाही को रोक सकी। वह पाकिस्तान को समय रहते अलर्ट भेजने में भी नाकाम साबित हुई। अगर चीनी तकनीक में दम होता तो वह पाकिस्तानी आतंकवादियों के लिए कवच का काम करती। दुनिया जानती है कि भारतीय मिसाइलों ने आतंकवादियों का पूरी गर्जना के साथ संहार किया था। वास्तव में चीनी मीडिया द्वारा दी गई जानकारी इस बात की पुष्टि करती है कि भारतीय मिसाइलों, ड्रोनों और एयर डिफेंस सिस्टम के आगे चीनी तकनीक टिक ही नहीं सकी। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के साथ चीन को शिकस्त दी थी। यही नहीं, कई रिपोर्टों में तुर्किये द्वारा पाकिस्तान का साथ दिए जाने की पुष्टि की गई थी। इस तरह पाक-चीन के साथ तुर्किये की तकनीक भी भारतीय मिसाइलों के सामने बेदम साबित हुई थी।    

चीन चाहता है कि वह अपनी तकनीक के संबंध में दावा कर अपने हथियारों के लिए नया बाजार खोजे। अगर कोई देश इन दावों पर विश्वास कर खरीदारी करेगा तो उसे याद रखना चाहिए कि उसका हश्र भी वैसा ही होगा, जैसा एक साल पहले चीनी हथियारों का हुआ था। चीन द्वारा विकसित की गई तकनीक उस खिलौने की तरह है, जो मेले में अपने आकर्षण के कारण खरीदा तो जाता है, लेकिन वह घर पहुंचते-पहुंचते खराब हो जाता है। उसके बाद किसी काम का नहीं रहता है। चीन की इस स्वीकारोक्ति के बाद भारतवासियों को एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए। पाकिस्तानी आतंकवाद के पीछे चीन खड़ा है। चीनी संसाधनों का इस्तेमाल हमारे सैनिकों और नागरिकों का लहू बहाने के लिए किया जा रहा है। चीन का पूरी तरह बहिष्कार होना चाहिए। उसका माल नहीं खरीदना चाहिए। चीन बेशक सस्ती चीजें बनाता है, लेकिन उनकी असल कीमत क्या है? हमारे देशवासियों की जान! क्या यह हकीकत खुलकर सामने आने के बाद भी हमें चीनी माल खरीदने के लिए लालायित रहना चाहिए? चीन वर्षों से पाकिस्तान के लिए ढाल बनकर खड़ा है। चीनी मदद के बिना पाकिस्तान इतनी लंबी अवधि तक आतंकवाद का खेल नहीं खेल सकता था। वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसका बचाव करता रहा है। इस समय भारत सरकार को चाहिए कि वह स्वदेशी उद्योग-धंधों को तेजी से बढ़ावा दे। हमारे बाजारों में चीनी माल नहीं, बल्कि वह माल बिकना चाहिए जिसमें भारतीय श्रमिकों का पसीना लगा हो। चीन अपने खजाने के जरिए आतंकवाद फैला रहा है। हमें उसके खजाने को चोट पहुंचानी होगी। दुश्मन से युद्ध लड़ना सिर्फ हमारे सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं है। यह सबकी जिम्मेदारी है। हर नागरिक को भारत मां का सैनिक बनना होगा। हर युद्ध सरहद पर नहीं लड़ा जाता। कुछ युद्ध बाजारों में खामोशी से लड़े जाते हैं। हमें अपने बाजारों को मजबूत बनाना होगा। चीनी माल इतनी दूर से भारतीय बाजारों में आ जाता है, वह छा जाता है। क्या हम अपने बाजारों में उससे बेहतर माल पेश नहीं कर सकते? अगर आतंकवाद का और ज्यादा दृढ़ता से मुकाबला करना है, उसे परास्त करना है तो 'स्वदेशी' को अपनाना ही होगा।

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