राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जनसंख्या नियंत्रण के संबंध में पूछे गए एक सवाल का यह जवाब देकर जनभावनाओं का विशेष ध्यान रखा है कि 'कोई भी कानून तभी सफल हो सकता है, जब उसे जनता का सहयोग मिले।' वैसे, आज लोग काफी जागरूक हो चुके हैं। अगर अब सरकार इस दिशा में कोई कानूनी कदम उठाती है तो उसे समर्थन मिलने की ज्यादा संभावना है। हर राज्य में जनसंख्या नियंत्रण की जरूरत भी नहीं है। सिक्किम, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने बहुत अच्छा काम किया है। वहां कुल प्रजनन दर में उल्लेखनीय कमी आई है। वहीं, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मेघालय, मणिपुर में यह प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से ऊपर है। अगर आजादी के तुरंत बाद जनसंख्या नियंत्रण के लिए ठोस नीतियां लागू की जातीं तो आज देश में हालात बहुत बेहतर होते। भारत में जनसंख्या ज्यादा है, लेकिन सुविधाएं उस अनुपात में नहीं बढ़ाई गईं। जो लोग वोटबैंक के लिए जनसंख्या बढ़ाने का आह्वान करते रहते हैं, उन्हें गर्मियों में एक दिन ट्रेन के जनरल डिब्बे में सफर करना चाहिए। पता चल जाएगा कि आम आदमी ऐसा जीवन व्यतीत कर रहा है! आज हर जगह भीड़ ही भीड़ है। बस स्टैंड पर अपनी बारी आने में पसीने छूट जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में मरीजों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। बेरोजगारी का दंश भोगते युवा जाएं तो कहां जाएं? एक-एक पद के लिए हजारों लोग कतारों में खड़े हैं। जो व्यक्ति इस दुनिया में आता है, उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार, साफ हवा, पानी, भोजन जैसी मूलभूत सुविधाएं मिलनी चाहिएं। क्या आम आदमी को गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं मिल रही हैं?
हमारे कई शहरों का एक्यूआई सामान्य से ज्यादा है। राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। बाजारों में मिलावटी और नकली चीजों की भरमार है। कई लोग नकली दूध, पनीर, मावा, मिठाई और दवाई तक बेच रहे हैं, क्योंकि कार्रवाई का डर नहीं है और इस बात की गारंटी है कि माल तुरंत बिक जाएगा। हमारे शहर इतनी जनसंख्या का दबाव बर्दाश्त करने के लिए नहीं बसाए गए थे। प्राय: नेतागण इस मुद्दे पर बोलने से कतराते हैं। उन्हें लगता है कि इससे लोग नाराज हो जाएंगे और उनके वोट टूट जाएंगे। हालांकि अब स्थिति बहुत बदल गई है। लोग इस मुद्दे पर खुलकर बात करने लगे हैं। अगर नेतागण इस पर चर्चा करेंगे तो लोग सुनेंगे। भारत में मौजूदा जनसंख्या के लिए भोजन, शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा, परिवहन जैसी सुविधाओं का इंतजाम करना बहुत मुश्किल हो रहा है। क्या जो बच्चे भविष्य में जन्म लेने वाले हैं, वे बेहतर सुविधाओं के हकदार नहीं हैं? क्या हम चाहते हैं कि वे भी रोजगार के लिए धक्के खाएं और लंबी कतारों में इंतजार करते हुए अपनी जवानी खपाएं? जिन राज्यों में जन्म दर 2.1 या इससे नीचे चली गई, उन्हें सम्मानित करना चाहिए। जिन राज्यों में जन्म दर सामान्य से ज्यादा है, वहां लोगों को परिवार नियोजन के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। यह काम जोर-जबरदस्ती से नहीं हो सकता। चीन ने ऐसा ही किया था, जिसके नतीजे घातक रहे। वहां एकल संतान नीति के कारण कई परिवारों में रिश्ते खत्म हो गए। भारत में प्रोत्साहन से ही अच्छे नतीजे मिल सकते हैं। जिन लोगों की तीन से कम संतानें हों, उन्हें लाभ दिए जाएं। उनके लिए सरकारी योजनाओं में विशेष प्रावधान किए जाएं। उनके बच्चों को प्रवेश परीक्षाओं में कुछ अंकों की रियायत दे सकते हैं। उन्हें बैंक जमा और बचत योजनाओं में ज्यादा ब्याज देना चाहिए। इससे ज्यादा जन्म दर वाले राज्य भी प्रतिस्थापन स्तर पर आने के लिए पूरे प्रयास करेंगे।