अजेय होने का भ्रम न पालें

लोकतंत्र में जनता ही निर्णायक शक्ति होती है

जब जनता ठान लेती है तो बड़े-बड़े धुरंधरों को दिन में तारे दिखा देती है

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया निराशाजनक है। वरिष्ठ नेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे शब्दों का चयन सोच-समझकर करेंगे और चुनाव हार जाने के बाद अपनी गलतियों को स्वीकार करेंगे। भारत में बड़े-बड़े नेता चुनाव हारे हैं। ममता बनर्जी ने जिस तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग को अपनी हार का जिम्मेदार ठहराया है, वह अनुचित है। अगर वे पिछले डेढ़ दशक में अपनी सरकार और पार्टी के कारनामों पर गौर करतीं तो आज उनका जवाब कुछ और होता। देश में यह खतरनाक चलन जोर पकड़ता जा रहा है। नेताओं का एक वर्ग जब चुनाव जीतता है तो उसे सबकुछ ठीक दिखता है। अगर वह भविष्य में चुनाव हार जाता है, तब या तो ईवीएम में दोष ढूंढ़ता है या चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराता है। ममता बनर्जी को साल 2011, 2016 और 2021 में सबकुछ ठीक लगा, क्योंकि तब तृणकां सत्ता में आई थी। फिर, साल 2026 में ऐसा क्या हो गया? नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता ही निर्णायक शक्ति होती है। अगर आपको एक या इससे ज्यादा बार कुर्सी मिल गई तो इसका यह मतलब नहीं कि वह आपके नाम लिख दी गई है। प्राय: कई नेताओं को अहंकार हो जाता है। वे चुनाव पर चुनाव जीतते जाते हैं तो इस भ्रम के शिकार हो जाते हैं कि 'हम हमेशा जीतते रहेंगे, हम किसी को भी जिता या हरा सकते हैं, हमें कोई शिकस्त नहीं दे सकता।' उनका यह भ्रम तब टूटता है, जब चुनाव में करारी हार मिलती है। तब उन्हें व्यवस्था में कमियां दिखाई देने लगती हैं। वे यह नहीं देखते कि सबसे बड़ी कमी खुद की कार्यशैली में थी। नेताओं को सत्ता जनता की सेवा करने के लिए मिलती है। वे खुद को अजेय समझने की भूल न करें। जब जनता ठान लेती है तो बड़े-बड़े धुरंधरों को दिन में तारे दिखा देती है।

इन चुनाव नतीजों के बाद बांग्लादेशी मीडिया बेसुरा राग क्यों अलाप रहा है? क्या उसे इस बात का डर सता रहा है कि अब सीमा नीति सख्त हो सकती है? हाल में एक बांग्लादेशी नेता ने तो इस मुद्दे पर खुलकर अपनी चिंता जाहिर की थी कि 'प. बंगाल में भाजपा सरकार बनने पर लोगों (घुसपैठियों) को वापस धकेला जा सकता है।' सवाल है- बांग्लादेशियों का बोझ भारत क्यों उठाए? उनके पास अलग देश है। उन्हें वहां रहना चाहिए। अगर कोई बांग्लादेशी नागरिक भारत आना चाहता है तो उसे सभी नियमों का पालन करना होगा। अगर अवैध तरीके से आएगा तो कार्रवाई का सामना करना होगा। तृणकां के शासन में घुसपैठियों के लिए आनंद के दिन थे। अब उन्हें वापस भेजे जाने का डर सता रहा है। केंद्र सरकार और प. बंगाल की नई सरकार को एक बात का विशेष ध्यान रखना होगा। भविष्य में जब अवैध बांग्लादेशियों को निकालने की बात होगी तो कथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग न्यायालय का द्वार खटखटाएगा। वह इस प्रक्रिया को विफल करने के लिए पूरा जोर लगाएगा। उस समय सरकार को अपना पक्ष मजबूती से रखना होगा। घुसपैठियों के पक्ष में करुणा का माहौल बनाने की कोशिश हो सकती है, जिसकी असलियत दृढ़ता से बतानी होगी। याद करें, पिछले साल पहलगाम हमले के बाद जब पाकिस्तानियों को निकाला जा रहा था, तब कुछ लोग उनके पक्ष में माहौल बनाने में जुटे थे। वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि लोग इतने वर्षों से रह रहे हैं तो उन्हें यहीं रहने दिया जाए! ऐसे कथित क्रांतिकारी भविष्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए भी यही तर्क दे सकते हैं। क्या वर्षों से किसी के मकान पर अवैध कब्जा करके बैठने से वह उसका हो जाता है? क्या उसके पक्ष में यह कहना सही है कि अब यह कहां जाएगा, इसका अवैध कब्जा बरकरार रहने दें? जो अवैध बांग्लादेशी आए थे, उन्हें किसी ने पीले चावल भेंट कर न्योता नहीं भेजा था। वे अपने जोखिम पर आए थे। अब 'घर' लौटने के दिन आ गए हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों को सख्त संदेश देना बहुत जरूरी है। अगर अब सरकार ऐसा नहीं कर पाई तो घुसपैठियों का दुस्साहस बहुत बढ़ जाएगा।

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