आदतें सुधारें, देश को स्वच्छ बनाएं

क्या गंदगी फैलाने वाले लोग विदेश से चले आ रहे हैं?

लोग सुविधाएं शानदार चाहते हैं, लेकिन आदतों में सुधार नहीं करना चाहते

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिक्किम में स्वच्छता की स्थिति पर टिप्पणी कर इस राज्य के निवासियों से प्रेरणा लेने का आह्वान किया है। अक्सर सिक्किम की साफ सड़कों और निर्मल हवाओं की चर्चा सोशल मीडिया पर होती है। यहां लोगों ने स्वच्छता का आदर्श स्तर कायम रखा है, जो प्रशंसनीय है। सिक्किम के निवासियों ने दिखा दिया है कि स्वच्छता सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सबकी जिम्मेदारी है। अगर हम किसी जगह को स्वच्छ और सुंदर बनाना चाहते हैं तो सिक्किम के लोगों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। भारत में कई लोग जब किसी जगह की स्वच्छता और सुंदरता की तारीफ करते हैं तो कहते हैं, 'वह जगह इतनी सुंदर थी ... जैसे फिल्मों में दिखाते हैं ... ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम इंडिया में हैं!' क्या स्वच्छ और सुंदर जगह सिर्फ विदेश में हो सकती है? क्या भारत में किसी जगह को स्वच्छ रख पाना असंभव है? जब कभी स्वच्छता की बात होती है तो कहा जाता है कि 'भारत में इस वजह से कचरे के ढेर लगे हुए हैं, क्योंकि यहां जनसंख्या बहुत बढ़ गई है।' अगर भारत में 140 करोड़ लोग हैं तो सफाई करने के लिए 280 करोड़ हाथ भी हैं। इस तरह तो हमारा देश पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा स्वच्छ होना चाहिए! वास्तव में गंदगी के लिए ज्यादा जनसंख्या को जिम्मेदार ठहरा देना एकपक्षीय दृष्टिकोण है। स्वच्छता को आदत बना दिया जाए तो जनसंख्या बहुत बड़ा वरदान बन सकती है। हमारे आस-पास ऐसे लोग दिख जाएंगे, जो गंदगी फैलाने को अपना अधिकार समझते हैं, जहां उनका मन करता है, वहां थूक देते हैं, फलों-सब्जियों के छिलके बिखेर देते हैं ... उसके बाद शिकायत करते हैं कि देश में सफाई नहीं है। क्या गंदगी फैलाने वाले लोग विदेश से चले आ रहे हैं?

अगर कोई व्यक्ति किसी को स्वच्छता का महत्त्व समझाते हुए गंदगी फैलाने से रोकता है तो उसके साथ हिंसक घटना भी हो सकती है। एक सोसाइटी में रहने वाले कुछ परिवार बासी खाना और फलों-सब्जियों के छिलके ऐसी जगह डालते हैं, जहां मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं। इससे एक परिवार को बहुत परेशानी होती है। बरसात के मौसम में स्थिति और बिगड़ जाती है। जब वह परिवार अन्य लोगों से निवेदन करता है कि 'यहां बासी खाना और छिलके न डालें' तो उनका जवाब होता है, 'हम ही तो अकेले नहीं डाल रहे? पहले उन सबको रोकें।' यानी, पहले सबको सुधार कर आएं, उसके बाद हम सुधरने के बारे में सोचेंगे! जयपुर से चलने वाली एक ट्रेन के जनरल डिब्बे में कुछ बच्चे मूंगफली खाकर छिलके वहीं बिखेर रहे थे। एक यात्री ने उनसे कहा, 'छिलके एक जगह इकट्ठे कर लें, इस तरह न बिखेरें', तो बच्चों के माता-पिता भड़क उठे, 'हमने किराया दिया है। हमारे बच्चे ही गंदगी फैला रहे हैं क्या? मूंगफली खा रहे हैं तो अपने पैसों की खा रहे हैं। आपका क्या जाता है? अगर सफाई का इतना ज्यादा शौक है तो झाड़ू लेकर पूरी ट्रेन साफ कर दें! हमारे बच्चों को कुछ कहेंगे तो ठीक नहीं रहेगा। हमें सफाई का पाठ न पढ़ाएं।' जब लोगों का रवैया ऐसा होगा तो स्वच्छता का स्तर क्या होगा? क्या ट्रेन का किराया देने का यह मतलब है कि उस व्यक्ति को गंदगी फैलाने का लाइसेंस मिल गया? लोग सुविधाएं शानदार चाहते हैं, लेकिन अपनी आदतों में सुधार नहीं करना चाहते। जब कोई उन्हें स्वच्छता का महत्त्व समझाता है तो वे इसे अपनी प्रतिष्ठा पर प्रहार समझ लेते हैं और झगड़ा करने लगते हैं। हम अपनी हर समस्या के लिए विदेशी आक्रांताओं को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। कई समस्याएं हमारी गलत आदतों की वजह से भी हैं। उनका समाधान असंभव नहीं है। हमें अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। आदतों को सुधारना होगा। स्वच्छता की शुरुआत हमसे होती है। अगर हम गंदगी फैलाना बंद करें, स्वच्छता का प्रसार करें तो भारत स्वच्छता सूचकांक में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सकता है।

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