गैलप और कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के अध्ययन में विद्यार्थियों द्वारा एआई टूल्स के इस्तेमाल को लेकर जो निष्कर्ष साझा किए गए हैं, वे चिंताजनक हैं। अभी दुनियाभर में एआई के चर्चे हैं। इसे जादू की ऐसी छड़ी की तरह पेश किया जा रहा है, जिसके पास हर सवाल का जवाब है। ये जवाब कितने सही हैं? इनका आधार क्या है? इस पर अभी ज्यादा जानकारी नहीं दी जा रही है। हर काम, खासकर पढ़ाई में एआई टूल्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने में कई जोखिम हैं। उक्त अध्ययन के इन निष्कर्षों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता कि एआई टूल्स पर ज्यादा निर्भरता मौलिक बुद्धि पर नकारात्मक असर डाल सकती है। कई बच्चे इनके इतने आदी हो चुके हैं कि वे ज्यादातर विषयों के गृहकार्य एआई टूल्स से पूछकर करते हैं। गणित का कोई सवाल हो, विज्ञान का कोई प्रयोग हो, अंग्रेजी या हिंदी में कोई निबंध लिखना हो, वे एआई टूल्स से पूछकर हूबहू लिख देते हैं। वे कुछ भी सोचना-समझना नहीं चाहते। उनका काम आसानी से हो रहा है। उन्हें बहुत कम मेहनत करनी पड़ रही है। बस, यह उनके लिए काफी है। माता-पिता भी यह सोचकर खुश हैं कि बच्चे जो कुछ जानना-पूछना चाहते हैं, वह सब आसानी से उपलब्ध है। इन बच्चों को अभी तो फायदे दिखाई दे रहे हैं, लेकिन लंबी अवधि में इससे बड़ा नुकसान हो सकता है। सबसे बड़ा नुकसान यह है कि सोचने-समझने और तर्क करने की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। किसी सवाल का जवाब सोचने और लिखने से बौद्धिक विकास होता है। इससे तर्क क्षमता बढ़ती है।
अगर बच्चे हर सवाल का जवाब एआई से पूछकर लिखेंगे तो उनका बौद्धिक विकास कैसे होगा और तर्क क्षमता कैसे बढ़ेगी? कई बार एआई टूल्स गलत जानकारी देते हैं। विद्यार्थी उस पर आंखें मूंदकर विश्वास करते हैं। जब शिक्षक बताते हैं कि यह गलत है तो उन्हें आश्चर्य होता है कि एआई टूल्स भी गलती कर सकते हैं! हां, एआई टूल्स गलती कर सकते हैं और कई बार बड़ी गलती कर सकते हैं। एक विद्यार्थी को किसी कविता की व्याख्या लिखनी थी। उसने पृष्ठ की फोटो खींचकर एआई टूल को भेज दी। एआई ने व्याख्या तो काफी हद तक सही लिखी, लेकिन कवि का नाम गलत लिखा। हाल में उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में दायर ऐसी याचिकाएं चर्चा में रहीं, जिन्हें पढ़कर न्यायाधीशों ने याचिकाकर्ताओं को फटकार लगाई। उनमें ढेरों गलतियां थीं। अगर एआई टूल्स लगातार गलत जानकारी देते रहेंगे और विद्यार्थी उन पर विश्वास करते रहेंगे तो उनका भविष्य क्या होगा? वे तो गलत को ही सही मान लेंगे! अस्सी और नब्बे के दशक में स्कूली विद्यार्थियों के बीच कुंजियां बहुत लोकप्रिय होती थीं। उन्हें पढ़ना प्रशंसनीय तो नहीं माना जाता था, लेकिन विद्यार्थियों को काफी सुविधा हो जाती थी। उन्हें सवालों के जवाब आसानी से मिल जाते थे। कई विद्यार्थी गृहकार्य में कुंजी का जवाब हूबहू उतार देते थे। कुछ कुंजियों में जवाब की जगह लिखा होता था- 'छात्र स्वयं करें।' कई कुंजीप्रेमी छात्र जवाब में यही लिख देते थे। उन्हें लगता था कि जो कुछ कुंजी में लिखा है, वही सही है और हमारे लिए काफी है। शिक्षक उनकी गलती पकड़ लेते थे। जब पूछताछ होती तो वे दावा करते थे कि कुंजी से नहीं, अपनी बुद्धि से लिखा है। हालांकि बाद में गलती स्वीकार कर लेते थे। पढ़ाई में एआई टूल्स का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं करना चाहिए। इनके कुछ फायदे हैं, जिनसे विद्यार्थियों को वंचित करना उचित नहीं है। इस्तेमाल की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए, ताकि बच्चों का बौद्धिक विकास अवरुद्ध न हो। एआई पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय इसके साथ संतुलन बनाकर चलने की जरूरत है।