देश में विभिन्न बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों के बीच कहीं खुशी तो कहीं गम का माहौल देखने को मिल रहा है। वहीं, कुछ बच्चे कम नंबर आने के कारण गलत कदम उठा रहे हैं, जो अत्यंत दु:खद है। हर साल ऐसा ही होता है। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी नहीं होनी चाहिए, जो हर बच्चे को जीवन जीने के लिए नई ऊर्जा दे? वर्तमान प्रणाली ऐसा नहीं कर रही है। जो बच्चे अच्छे अंक लेकर आते हैं, वे प्रतिभाशाली होते हैं। जो बच्चे किसी कारणवश ऐसा नहीं कर पाते, क्या उनमें कोई प्रतिभा नहीं होती? जब कोई बच्चा गलत कदम उठा लेता है तो दूसरों के लिए वह सिर्फ एक खबर होती है, लेकिन माता-पिता के लिए दु:ख का पहाड़ होता है, जिसे वे कभी नहीं भुला पाते। हर बच्चा न्यूटन-आइंस्टीन नहीं बन सकता। इस बात को समझना होगा। कई बच्चे सालभर पढ़ते हैं, लेकिन परीक्षा में उत्तर लिखते समय भूल जाते हैं या गलतियां कर बैठते हैं। इस वजह से उनके कम नंबर आते हैं। कई बच्चे खूब मेहनत करते हैं, उनके नंबर भी अच्छे आते हैं, लेकिन वे संतुष्ट नहीं होते। वे नतीजे आने के बाद खाना-पीना छोड़ देते हैं। परिजन बड़ी मुश्किल से उन्हें मनाते हैं। ये बच्चे परीक्षा की तैयारी के दौरान और नतीजे आने के बाद खुश नहीं रह पाते। अब समय आ गया है कि शिक्षा प्रणाली में बड़े सुधार हों। यह हर बच्चे की नैसर्गिक प्रतिभा को पहचाने, न कि सिर्फ ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने पर जोर दे। इन दिनों सोशल मीडिया पर कई लोग अपने अनुभव साझा करते मिल जाएंगे, जो कभी क्लास टॉपर या बोर्ड टॉपर थे। उस समय उन्होंने अपने नंबरों के आधार पर जीवन को लेकर जो कल्पनाएं की थीं, हकीकत उससे बिल्कुल अलग निकली।
बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें, लेकिन उन्हें असफलता का सामना करना भी सिखाएं। उन्हें बताएं कि कम नंबर लाना कोई पाप नहीं है। हां, मेहनत करनी चाहिए। बुरी आदतों से दूर रहना चाहिए। खासकर उन आदतों से जो पढ़ाई में प्रदर्शन पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं। कई बच्चे सालभर मोबाइल फोन चलाते हैं। उस समय वे पढ़ाई की उपेक्षा करते हैं। जब उनसे कहा जाता है कि 'पढ़ाई की ओर ध्यान नहीं दे रहे हो और मोबाइल फोन बहुत ज्यादा चला रहे हो', तो वे रूठ जाते हैं। इसके बाद उन्हें मनाना पड़ता है, पढ़ाई का महत्त्व समझाना पड़ता है। वे अपनी आदत में सुधार लाने का वादा भी करते हैं, लेकिन अगले दिन वही सब दोहराने लगते हैं। वे ऐसे मौके ढूंढ़ते रहते हैं, जो उन्हें पढ़ाई से बचा लें। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं होती है कि उनकी पढ़ाई-लिखाई के लिए माता-पिता को बहुत त्याग करने पड़ रहे हैं। उन बच्चों को अनुशासित करना चाहिए। अगर जरूरत पड़े तो मनोवैज्ञानिक परामर्श दिलाना चाहिए, अतिरिक्त कक्षाओं के विकल्प पर विचार करना चाहिए। अगर कोई बच्चा अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहा है। इसके बावजूद नंबरों में कहीं कमी रह जाए तो उसका मनोबल बढ़ाना चाहिए। रिश्तेदारों को एक बात याद रखनी चाहिए- किसी बच्चे की पढ़ाई-लिखाई के मामले में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। कई रिश्तेदार ऐसे होते हैं, जो सालभर किसी से मतलब नहीं रखते, लेकिन जब बोर्ड परीक्षा का नतीजा आने वाला होता है तो वे बार-बार फोन करने लगते हैं। वे रोल नंबर मांगते हैं या खुद चले आते हैं। एक तरफ चाय-नाश्ता होता है, दूसरी तरफ बच्चे को ताने मारने का दौर चलता रहता है। आजकल के कई बच्चे इसलिए भी रिश्तेदारों से चिढ़ते हैं, क्योंकि वे परीक्षा के नतीजे आने पर उन्हें सबके सामने लज्जित करते हैं। बच्चों के साथ ऐसा बर्ताव करना ठीक नहीं है। अक्सर ऐसी घटनाएं बाद में गहरी कड़वाहट में बदल जाती हैं।