अभी टीसीएस वाला मामला शांत नहीं हुआ था कि अमरावती से एक मामला और आ गया। पुलिस ने कई युवकों को नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण करने और उनके आपत्तिजनक वीडियो प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। देश में यह क्या हो रहा है? अब तो आए दिन ऐसी ही खबरें पढ़ने को मिल रही हैं! क्या ऐसी घटनाएं सिर्फ कानूनी कार्रवाई से रुक जाएंगी? एक समाज के तौर पर हम किस दिशा में जा रहे हैं? अगर यही चलता रहा तो समाज का भविष्य क्या होगा? देश का भविष्य क्या होगा? अमरावती मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपियों की तस्वीरें देखकर लगता है कि उन्हें न तो कोई डर है और न अपने कृत्य पर कोई पछतावा है। आज माता-पिता के तौर पर, समाज के जिम्मेदार लोगों के तौर पर हमें कई सवालों पर गंभीरता से विचार करना होगा। आखिर क्या वजह है कि हमारी बेटियां ऐसे हैवानों के जाल में इतनी आसानी से फंस रही हैं? इस सवाल को यह कहकर खारिज नहीं कर सकते कि 'सबके साथ ऐसा नहीं होता।' क्या इस सवाल पर तभी सोच-विचार करना चाहिए, जब घर की किसी बेटी पर आंच आए? अन्य घरों की बेटियां भी हमारी बेटियां हैं। क्या उनकी सुरक्षा के लिए सबको चिंतन नहीं करना चाहिए? हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि हद से ज्यादा आज़ादी घातक होती है। बच्चों को आज़ादी जरूर दें। उन पर कोई चीज थोपें नहीं, लेकिन उन्हें सही-गलत का बोध भी कराएं। उन्हें बताएं कि यह दुनिया बॉलीवुड की कोई फिल्म नहीं है कि यहां वायलिन बजते ही ठंडी हवाएं चलने लगेंगी, आसमान से गुलाब के फूल बरसने लगेंगे और सबकुछ अच्छा हो जाएगा।
इन दिनों जैसी खबरें आ रही हैं, उनके आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि इन्सानों के वेश में कई हैवान घूम रहे हैं। उनका काम ही यह है कि किसी भी तरह से दूसरों की बहन-बेटियों को प्रेमजाल में फंसाएं और अपनी गंदी इच्छाएं पूरी करें। पहले, ऐसी घटनाएं कम ही सुनने को मिलती थीं। तब सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे होते थे, लेकिन बच्चों पर नजर रहती थी। किसी का लड़का कहीं आवारा घूमता, गलत गतिविधि करता दिख जाता तो उसकी सूचना घर पर पहुंचा दी जाती थी। कई बार तो ऐसा होता कि लड़का बाद में घर पहुंचता, उसकी सूचना देने वाले पहले पहुंच जाते थे। जिन लड़कों को गुटखा, बीड़ी आदि की आदत होती, वे आस-पास की दुकानों से खरीदने से डरते थे, क्योंकि दुकानदार उनके दादा या पिता के सामने पूरी पोल-पट्टी खोल देता था। जो विद्यार्थी अपनी कक्षाएं छोड़कर कहीं मटरगश्ती करने चले जाते, उन्हें सबसे ज्यादा डर इस बात का होता था कि कहीं कोई परिचित न देख ले। सिनेमा हॉल के आस-पास या उसके रास्ते में किसी परिचित की दुकान होती तो ऐसे विद्यार्थियों के लिए उनकी आंखों में धूल झोंक पाना लगभग असंभव था। फिल्म बाद में पूरी होती, उससे पहले पिताजी या शिक्षक सिनेमा हॉल के द्वार पर 'स्वागत-सत्कार' करने के लिए पहुंच जाते थे। हालांकि बिगड़ने वाले बच्चे उस समय भी बिगड़ते थे, लेकिन जैसी घटनाएं अब हो रही हैं और इतनी ज्यादा हो रही हैं, तब ऐसी न के बराबर होती थीं। अब किसी का लड़का दोस्तों के साथ ठेके पर चला जाए, किसी की बेटी संदिग्ध लोगों के साथ मॉल में घूमती नजर आए और कोई शुभचिंतक उनके माता-पिता को सूचित कर दे तो वे उल्टे उसे ही फटकार लगा देंगे- 'अपने काम से काम रखें, आपको हमारे बच्चों की पर्सनल लाइफ से क्या मतलब है?' ब्याह-शादियों में लोग पहले भी खूब नाचा करते थे, लेकिन कुछ मर्यादाएं थीं। उस घर में बहन-बेटियों के लिए एक जगह निश्चित कर दी जाती थी। जब वहां नाच-गाना होता तो बड़े-बूढ़े उधर बिल्कुल नहीं जाते थे। आज लोग सड़कों पर किस तरह नाच रहे हैं? वीडियो वायरल करने के लिए कैसी हरकतें कर रहे हैं? पहले हमें मर्यादा में रहना सीखना होगा। अगर हमने व्यक्ति, परिवार और समाज के स्तर पर अपने लिए मर्यादाओं का निर्धारण कर लिया तो कोई व्यक्ति अमरावती कांड जैसी घटनाओं को अंजाम देने का दुस्साहस नहीं कर पाएगा।