एकता की डोर को मजबूत करती हिंदी

हिंदी के बिना कैसा हिंदुस्तान?

कर्नाटक राज्य बोर्ड के विद्यार्थी पुरानी पीढ़ी से ज्यादा जागरूक हैं

कर्नाटक राज्य बोर्ड में तीसरी भाषा के तौर पर लगभग 93 प्रतिशत विद्यार्थियों ने हिंदी का चयन कर उन राजनेताओं के दावों को खारिज किया है, जो भाषावाद का मुद्दा भड़का कर सियासी रोटियां सेकते हैं। भारत संभवत: एकमात्र ऐसा देश है, जहां वोटबैंक के लिए उसकी सबसे ज्यादा प्रचलित और सबको जोड़ने वाली भाषा का विरोध किया जाता है। ब्रिटेन के लोग अंग्रेजी पर गर्व करते हैं। रूस में रूसी भाषा का सबसे ज्यादा आदर किया जाता है। चीन में चीनी (मंदारिन) भाषा सर्वोपरि है। दक्षिण कोरिया के लोग कहते हैं कि हमने अपनी भाषा के बल पर उन्नति की है और किसी विदेशी भाषा की जरूरत ही नहीं है। जापानियों का देशप्रेम और भाषाप्रेम किसी से छिपा नहीं है। अगर वहां किसी को नौकरी करनी है, व्यापार करना है, तो जापानी भाषा के बिना गुजारा नहीं हो सकता है। जब भारत में कुछ राजनेता हिंदी के विरोध में राग अलापते हैं तो हर विचारशील नागरिक के मन में प्रश्न पैदा होता है- यह कैसी राजनीति कर रहे हैं? हिंदी के बिना कैसा हिंदुस्तान होगा? कर्नाटक बोर्ड का उक्त आंकड़ा कई गहरी बातें कहता है। इन विद्यार्थियों ने माना है कि हिंदी तोड़ती नहीं, बल्कि सबको जोड़ती है। हिंदी की स्वीकार्यता इसलिए बढ़ती जा रही है, क्योंकि इसे सीखने से संपर्क और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। यह आंकड़ा उन दावों की भी पोल खोलता है, जिनमें कहा जाता है कि हिंदी की वजह से क्षेत्रीय भाषाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। हिंदी को हटाने के लिए पूर्व में कई कुतर्कों का सहारा लिया गया। इस मुद्दे को 'हिंदी बनाम अन्य भाषा' बनाने की कोशिश की गई। इसे कई जगह समर्थन भी मिला, लेकिन अब असलियत सामने आ रही है। यह कहना गलत नहीं होगा कि भाषा के मामले में कर्नाटक राज्य बोर्ड के विद्यार्थी पुरानी पीढ़ी से कहीं ज्यादा जागरूक हैं।

नई शिक्षा नीति त्रिभाषा व्यवस्था पर जोर देती है। इसमें क्षेत्रीय भाषाओं का पूरा ध्यान रखा गया है। इसके साथ अंग्रेजी के महत्त्व को स्वीकार किया गया है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। वहीं, तीसरी भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस भाषा को सीखने से अन्य राज्यों के साथ जुड़ाव बेहतर होगा। इससे हमारी राष्ट्रीय एकता और मजबूत होगी। कर्नाटक राज्य बोर्ड के कई विद्यार्थियों ने उर्दू, संस्कृत, अरबी, तुलु, कोंकणी और मराठी भाषा का चयन किया है। इन सभी भाषाओं के साथ हिंदी का बहुत गहरा संबंध है। उर्दू तो बनी ही हिंदी से है। अगर लिपि एक तरफ कर दें तो कुछ शब्दों का फर्क रह जाता है। संस्कृत को भाषाओं की जननी यूं ही नहीं कहा गया है। इसके हजारों शब्द सदियों की यात्रा करते हुए हिंदी में आए, जिन्हें पहचानना मुश्किल नहीं है। उर्दू में भी संस्कृत के शब्दों की भरमार है। अरबी एक विदेशी भाषा जरूर है, लेकिन इसके कई शब्द हिंदी में प्रचलित हैं। इससे हिंदी और समृद्ध हुई है। इस जुड़ाव से न तो अरबी का अस्तित्व खतरे में पड़ा और न हिंदी के सौंदर्य में कोई कमी आई। तुलु, कोंकणी और मराठी का हिंदी से वही संबंध है, जो किसी परिवार की बहनों में होता है। इनमें विभिन्न अक्षरों, शब्दों, लिपि और व्याकरण के स्तर पर अद्भुत समानता है। भले ही, बोर्ड स्तर के विद्यार्थियों को इन सभी भाषाओं के बारे में इतनी गहरी जानकारी न हो, लेकिन वे यह जरूर जानते हैं कि हिंदी का विरोध कुछ राजनेताओं को फायदा पहुंचाएगा, जबकि हिंदी का ज्ञान उन्हें भविष्य में फायदा देगा। सरकारी नौकरियों, बैंक, रेलवे और निजी क्षेत्रों में हिंदी का ज्ञान बहुत काम आएगा। अगर व्यापार करेंगे तो हिंदी का ज्ञान उसके विस्तार में मदद करेगा। क्षेत्रीय भाषा के साथ हिंदी सीखना विद्यार्थियों के आत्मविश्वास में वृद्धि करेगा। ऐसे विद्यार्थी अपने विचारों को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर पाएंगे और उन दूरियों को भी मिटाएंगे, जो कुछ राजनेताओं ने पैदा की हैं।

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