पीड़ित परिवार को मिला इंसाफ

पुलिस की वर्दी जनता की सेवा करने के लिए मिली है

यह लोगों को लूटने और पीटने का लाइसेंस नहीं है

तूतीकोरिन के सथानकुलम में हिरासत में क्रूरतापूर्वक यातना देकर पिता-पुत्र को मौत के घाट उतारने वाले नौ पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड सुनाए जाने से पीड़ित परिवार को इंसाफ मिला है। मदुरै की अदालत के इस फैसले के बाद आम लोगों का कानून पर भरोसा मजबूत हुआ है। अदालत का यह फैसला पीड़ित परिवार के घावों पर संतोष का मरहम लगाता है। साथ ही, ऐसे पुलिसकर्मियों को सख्त चेतावनी भी देता है, जो निर्दोष जनता पर अत्याचार करने में बड़प्पन महसूस करते हैं। पुलिस की वर्दी जनता की सेवा करने के लिए मिली है। यह लोगों को लूटने और पीटने का लाइसेंस नहीं है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएंगे तो देश का क्या होगा? पुलिसकर्मी भी इसी समाज का हिस्सा होते हैं। जब तक वे इस नौकरी में नहीं आते, उनका व्यवहार सामान्य होता है। जब नौकरी में चयन हो जाता है, वर्दी मिल जाती है, तब कई कर्मियों पर ऐसा कौनसा फितूर सवार हो जाता है कि वे आम आदमी को कुछ समझते ही नहीं? सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो देखने को मिलते हैं, जिनमें पुलिसकर्मी आम लोगों को पीटते, धमकाते, अपशब्द कहते, रिश्वत लेते नजर आते हैं। शक्ति का इतना नशा होना ठीक नहीं है। ऐसे पुलिसकर्मियों की वजह से पूरे विभाग की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है। पुलिस में नौकरी लगने का यह मतलब नहीं कि आप कोई वायसराय हो गए और अब चाहे जिसे मारें और चाहे जिसे छोड़ें। जो कर्मी ऐसा करता है, वह अपने लिए पापों की भारी गठरी तैयार करता है। वह भविष्य में उसे ही उठानी पड़ेगी। ऐसे कितने ही पुलिसकर्मियों की सत्य कथाएं सुनने को मिलती हैं, जिन्होंने कभी शक्ति के अहंकार में आकर लोगों पर खूब अत्याचार किए थे। एक दिन जब वक्त ने करवट ली तो सबकुछ खत्म हो गया। तब ऐसे पुलिसकर्मियों से किसी को सहानुभूति नहीं होती। लोग उनके उदाहरण देते हुए कहते हैं कि ये अपनी करनी का फल भोग रहे हैं।

मदुरै की अदालत का फैसला दिवंगत पिता-पुत्र की आत्मा को शांति देगा। हालांकि अभी लड़ाई बाकी है। ऐसे मामलों में आरोपी उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय चले जाते हैं। अगर वहां भी मृत्युदंड से कोई राहत न मिले तो राष्ट्रपति से क्षमादान की याचना करते हैं। इन सबमें कई साल लग सकते हैं। अगर ये पुलिसकर्मी सभी कानूनी विकल्प आजमाने के बाद आखिर में मृत्युदंड पा जाएं तो यह मामला देशभर में एक नजीर बन सकता है। इससे उन पुलिसकर्मियों और सरकारी कर्मचारियों को एक सबक मिलेगा, जो अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं। पुलिस का मुख्य काम है- लोगों की सुरक्षा करना और कानून के दायरे में रहते हुए अपराधियों को पकड़ना। पुलिसकर्मी को देखकर आम आदमी में सुरक्षा की भावना पैदा होनी चाहिए। वहीं, अपराधियों में डर का माहौल होना चाहिए। क्या ऐसा हो रहा है? अगर आजादी के इतने वर्षों बाद ऐसी पुलिस व्यवस्था है, जो आम आदमी में सुरक्षा की भावना पैदा नहीं कर सकी, तो यह अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है। अगर आज अकेला आम आदमी रात को किसी पुलिसकर्मी को देखता है तो डरता है। अगर उस पर कोई मुसीबत आ पड़े और थाने जाना हो तो कई बार सोचता है और ऐसे व्यक्ति को ढूंढ़ता है, जिसकी वहां 'जान-पहचान' हो। फिनलैंड, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, जापान, स्विट्जरलैंड जैसे देशों में पुलिस पर आम लोग बहुत भरोसा करते हैं। वहां पुलिस भी जनता के साथ जुड़कर काम करती है। जनता के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना अनिवार्य होता है। उच्च पारदर्शिता के लिए तकनीक का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इसका नतीजा है- वहां अपराध बहुत कम हैं, जनता में सुरक्षा की भावना है और पुलिसकर्मियों का बहुत सम्मान है। जनवरी 2023 में अमेरिका के सिएटल में भारतीय मूल की एक छात्रा की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। एक पुलिसकर्मी ने उसका मजाक उड़ाया था। उसकी यह हरकत ऑनलाइन रिकॉर्ड हो गई थी, जिसके सार्वजनिक होने पर भारी हंगामा खड़ा हो गया था। पुलिस विभाग ने उस कर्मी की हरकत को बहुत गंभीरता से लिया। उसकी जांच की और नौकरी से निकाल दिया। ऐसे पुलिसकर्मियों को समय पर कठोर दंड मिलना जरूरी है। इससे अन्य कर्मी अत्याचार करने से दूर रहेंगे।

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