दूसरा वियतनाम न बन जाए ईरान

ट्रंप इस युद्ध में बुरी तरह फंसते जा रहे हैं

ट्रंप शब्दों की मर्यादा भूलते जा रहे हैं

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शब्दों की मर्यादा भूलते जा रहे हैं। वे ईरान को धमकाने के लिए सोशल मीडिया पर जो सामग्री पोस्ट कर रहे हैं, वह किसी महान लोकतंत्र का नेतृत्व करने वाले राष्ट्रपति की तो बिल्कुल नहीं लगती। उन्होंने मंगलवार को 'पावर प्लांट डे' और 'ब्रिज डे' बताकर अपने इरादे पहले ही जाहिर कर दिए हैं। वास्तव में ट्रंप इस युद्ध में बुरी तरह फंसते जा रहे हैं। उन्हें बाहर निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। अगर वे ईरान के महत्त्वपूर्ण पावर प्लांट और पुलों को नष्ट करेंगे तो होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने की संभावनाओं को ध्वस्त कर देंगे। ईरान को भारी नुकसान हो चुका है। उसके तत्कालीन सर्वोच्च नेता से लेकर कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी मारे गए हैं। अरबों डॉलर की सार्वजनिक संपत्ति नष्ट हो चुकी है। हजारों आम नागरिकों की मौत हो गई है। अब यह सैन्य अभियान बंद होना चाहिए, क्योंकि इसका असर अन्य देशों पर पड़ रहा है। अमेरिका और इज़राइल के लिए दुश्मनी को ईरानी नेतृत्व हवा दे रहा था। उसके लिए आम ईरानी को सजा क्यों दी जाए? वह तो पहले ही सरकारी अत्याचार और महंगाई से त्रस्त है। अगर ट्रंप यह सोच रहे हैं कि पावर प्लांट उड़ा देने से ईरानी नेतृत्व तुरंत घुटनों पर आ जाएगा, तो ऐसा नहीं है। इससे सबसे ज्यादा दिक्कत आम जनता को होगी। ईरानी सरकार और सेना के पास तेल के भंडार हैं। उन्होंने पहले ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था कर ली होगी। ट्रंप सोच रहे हैं कि वे मौत का डर दिखाकर ईरान को झुका देंगे। यह डर काम करता है, लेकिन एक हद तक। जब लोगों के घर तबाह हो जाएंगे, उनके परिजन मारे जाएंगे, बेहतरी की कोई उम्मीद नहीं होगी तो उन्हें कोई डर नहीं रहेगा।

अगर ट्रंप (इराक व अफगानिस्तान की तरह) ईरान में सैनिक भेजकर सत्ता परिवर्तन करने का मंसूबा बना रहे हैं तो उनका रास्ता आसान नहीं होगा। उन्होंने ईरान से अपने दो पायलटों को निकालकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि अमेरिकी बल अत्यधिक शक्तिशाली हैं और वे असंभव को भी संभव बना सकते हैं। दूसरे पायलट का पता लगाने से पहले सीआईए ने अफवाहों का सहारा लिया। यह अभियान बहुत मुश्किल जरूर था, लेकिन हजारों की तादाद में अपने सैनिकों को भेजने से इसकी तुलना नहीं की जा सकती। वर्तमान में आईआरजीसी के कमांडर स्वेच्छा से फैसले लेकर धावा बोल रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि आयतुल्लाह खामेनेई ने पहले ही ऐसी व्यवस्था कर दी थी कि अगर वे अमेरिका-इज़राइल के हमले में मारे जाएं तो भविष्य में जवाबी हमले में कोई कमी न आए। इसका नतीजा दुनिया देख रही है। खामेनेई की हत्या को एक महीने से ज्यादा हो गया है। क्या इससे ईरान की आक्रामकता पर कोई नकारात्मक असर पड़ा? नहीं, बल्कि वह ज्यादा आक्रामक हो गया है। ईरान की जमीन पर सैकड़ों या हजारों अमेरिकी सैनिक उतरने से उन्हें जनता का समर्थन मिलने की संभावना नगण्य है। उस स्थिति में आईआरजीसी के अधिकारी व सैनिक छापामार युद्ध छेड़ सकते हैं। इससे अमेरिका को बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। उक्त दोनों देशों में सत्ता परिवर्तन के बावजूद अमेरिका धरातल पर कोई ठोस बदलाव लाने में विफल रहा था। वह जिस तरह अफगानिस्तान से निकला, उससे बहुत किरकिरी हुई थी। तब अमेरिकी सैनिकों की तस्वीरों ने वियतनाम की यादें ताजा कर दी थीं। कहीं अमेरिका के लिए ईरान दूसरा वियतनाम न बन जाए। इस सैन्य अभियान को यहीं रोक देने से अमेरिका कई अप्रिय अध्यायों का सामना करने से बच जाएगा।

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