राष्ट्रीय एकता और अनुशासन के सामने बड़े-बड़े संकट मामूली लगते हैं। वहीं, लोगों की हड़बड़ी, अफवाहों पर विश्वास और अनुशासनहीनता के कारण छोटी समस्याएं भी बड़े संकट में बदल सकती हैं। ईरान के साथ अमेरिका-इज़राइल का युद्ध छिड़ने के बाद भारत में कई लोग यही कर रहे हैं। अब सोशल मीडिया पर लॉकडाउन की अफवाह फैलाई जा रही है, जिसका केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने खंडन किया है। मंत्री के बयान पर भी इन लोगों को विश्वास नहीं हो रहा है। वे पेट्रोल पंपों पर अनावश्यक भीड़ लगा रहे हैं। यूट्यूब पर ज्यादा व्यूज पाने के लिए कई चैनल ऐसे वीडियो पोस्ट कर रहे हैं, जिनमें 'लॉकडाउन' शब्द का बार-बार जिक्र किया जा रहा है। एक यूट्यूबर इसे 'तेल अकाल' बता रही हैं। जब लोग दो-चार वीडियो ऐसे देख लेंगे तो उनमें घबराहट फैलना स्वाभाविक है। इसकी वजह से पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों के सामने भीड़ उमड़ रही है। एकसाथ सैकड़ों-हजारों लोग किसी चीज की मांग करेंगे तो वह तुरंत ही सबको उपलब्ध नहीं हो पाएगी। इससे फिर ऐसे कयासों को बल मिलेगा कि सच में किल्लत हो गई है। कल्पना कीजिए, अगर किसी बैंक शाखा में 100 लोगों को देने के लिए पर्याप्त नकदी है। अचानक सोशल मीडिया पर कोई अफवाह फैले और 800 लोग बैंक शाखा में नकदी लेने आ जाएं तो क्या स्थिति होगी? बैंक कर्मचारी सिर्फ 100 लोगों को नकदी दे पाएंगे। बाकी लोग यह सोचेंगे कि सोशल मीडिया पर जो पढ़ा था, वह बिल्कुल सही था, क्योंकि हमें तो नकदी मिली नहीं! आज कई जगह यही स्थिति है। जब केंद्र सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि देश में लगभग 60 दिनों का तेल भंडार है, एक महीने की एलपीजी आपूर्ति की व्यवस्था कर ली गई है, पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कोई कमी नहीं है, तो लोगों को थोड़ी शांति रखनी चाहिए।
पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों के सामने उमड़ रही भीड़ में ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें सच में ईंधन की सख्त जरूरत है, लेकिन अफवाहों के कारण उनकी बारी नहीं आ रही है। गांवों में जहां रसोईघर के ईंधन के लिए ढेरों विकल्प हैं, वहां लोग सिलेंडर लेने दौड़ रहे हैं! अगर ग्रामीण क्षेत्रों में लोग एक हफ्ते तक सिलेंडर लेने बिल्कुल न जाएं और ईंधन के अन्य विकल्पों का उपयोग करें तो सबको बहुत सुविधा होगी। लंबी-लंबी कतारें नहीं लगेंगी, अव्यवस्था नहीं फैलेगी। हमें अपने राष्ट्रीय चरित्र में कुछ आदतों को शामिल करने की जरूरत है। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली अफवाहों से सावधान रहें। विश्वसनीय स्रोतों से समाचार पढ़ें। अगर बाजार में कोई चीज सुलभ नहीं है और उसका उपयोग जरूरी है तो उसके विकल्पों पर विचार करें। ऐसा कई बार हुआ है, जब किसी चीज के भाव बढ़े तो लोग हड़बड़ी में उसी की खरीदारी करने लगे। कभी टमाटर के भाव बढ़ जाते हैं तो सोशल मीडिया पर खुराफाती तत्त्व सक्रिय हो जाते हैं। वे ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करते हैं कि अब दुनिया में कभी टमाटर खाने को नहीं मिलेगा। ऐसी पोस्ट पढ़कर लोग ज्यादा से ज्यादा टमाटर खरीदने की कोशिश करते हैं। इससे जमाखोर फायदा उठाते हैं। जब कभी प्याज के भाव बढ़ते हैं तो यही देखने को मिलता है। कई लोग अपनी जरूरत से पांच-छह गुना ज्यादा प्याज खरीद लेते हैं। ऐसे समय में अफवाहों पर विश्वास करने के बजाय जनता को एकजुट होकर दूसरा रास्ता अपनाना चाहिए। एक-डेढ़ हफ्ते तक वह चीज ही न खरीदें। उसके विकल्प ढूंढ़ें। जरूरत पड़े तो एआई की मदद लें। इससे जमाखोरों के हौसले पस्त होंगे। वे सारा माल कब तक दबाकर बैठे रहेंगे? जब लागत बढ़ेगी तो सामान्य कीमत पर बेचने को मजबूर होंगे। बाजार मांग और पूर्ति के आधार पर चलता है। जनता सूझबूझ से काम ले तो जमाखोरों की हर चाल नाकाम कर सकती है।