जमीन घोटाले के बहुचर्चित मामले में जेलयात्रा कर चुके एक मुख्यमंत्री ने हिंदू देवी-देवताओं पर जो टिप्पणी की है, वह वोटबैंक की राजनीति करने की ओछी हरकत है। कुछ कथित बुद्धिजीवी भी अक्सर सोशल मीडिया पर ऐसी टिप्पणियां करते पाए जाते हैं- दुनिया में सबसे ज्यादा सरस्वती की पूजा हमारे देश में होती है, लेकिन यहां इतने निरक्षर लोग क्यों हैं? सबसे ज्यादा लक्ष्मी की पूजा हमारे देश में की जाती है, लेकिन यहां करोड़ों लोग गरीब क्यों हैं? भारत में नदियों को माता का दर्जा दिया जाता है, लेकिन वे इतनी प्रदूषित क्यों हैं? गाय को माता का दर्जा दिया जाता है, लेकिन उसकी दुर्दशा क्यों है? आयुर्वेद को दिव्य ज्ञान कहा जाता है, लेकिन लाखों लोग बीमार क्यों हैं? अगर इन प्रश्नों में जिज्ञासा है तो इनका स्वागत है। अगर इन्हें तर्क के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो ये कुतर्क हैं। अर्जुन महान योद्धा थे। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके सारथी बने थे। उन्हें गीता का ज्ञान दिया था, लेकिन युद्ध अर्जुन एवं उनके भाइयों को ही लड़ना पड़ा था। हमारे धर्मग्रंथों में ऐसे असंख्य उदाहरण मिल जाएंगे, जिनका एक ही संदेश है- विवेक एवं बुद्धिपूर्वक अपना कर्तव्य निभाएंगे तो सफलता पाएंगे। अगर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं तो बैठे ही रह जाएंगे। हमारे देश में शिक्षा के क्षेत्र में कई समस्याएं सरस्वती की पूजा करने के कारण नहीं हैं। वे इसलिए हैं, क्योंकि सरकारों ने इस ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। जो मुख्यमंत्री सरस्वती पूजा पर सवाल उठा रहे हैं, उन्होंने अपने राज्य में कौनसे कैंब्रिज-ऑक्सफोर्ड खोल दिए? वहां सरकारी स्कूलों की क्या स्थिति है? उन्होंने कितने न्यूटन-आइंस्टीन बना दिए?
भारत में लक्ष्मी की पूजा करने के कारण गरीबी नहीं है। दशकों से यह कहकर देश के बहुसंख्यक वर्ग की आस्था पर चोट की जा रही है कि अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी जैसे देश लक्ष्मी की पूजा नहीं करते, इसलिए समृद्ध हो गए। ये देश अपनी आर्थिक नीतियों के कारण समृद्ध हुए हैं। वहां व्यापार के अनुकूल माहौल बनाया गया, जिससे लोगों का जीवन स्तर बेहतर हुआ। हमारे देश में सरकारों को कौन रोक रहा है? वे बेहतर नीतियां बनाएं, जनता उनका स्वागत करेगी। जो मुख्यमंत्री ऐसी नीतियां नहीं बना पाते, जो युवाओं को रोजगार नहीं दे पाते, वे कुतर्क देकर बहाने बनाते हैं। भारत में नदियों को माता का दर्जा दिए जाने के बावजूद वे इसलिए प्रदूषित हैं, क्योंकि उन्हें साफ रखने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए। प्रकृति ने बहुत सुंदर व्यवस्था की है- नदियों में गंदगी डालना बंद कर दें, वे अपनेआप साफ हो जाएंगी। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान नदियां साफ हो गई थीं। विदेशों में जहां नदियां बहुत साफ हैं, वहां कानूनों का खूब सख्ती से पालन किया जाता है। लोगों में जागरूकता भी है। अगर यही भारत में होने लगे तो नदियों की हालत में सुधार आ सकता है। इसके लिए नेतागण मुहिम चलाएं। नदियों के साथ तालाबों, बावड़ियों, जलाशयों की सफाई कराएं। जनता भी इसमें साथ देगी। गाय को माता का दर्जा देने के बावजूद उसकी दशा ठीक न होने के पीछे कई कारण हैं। लोग गौमाता के जयकारे तो बहुत लगाते हैं, जो अच्छी बात है, लेकिन जब दूध लेने की बारी आती है तो भैंस को प्राथमिकता देते हैं। खेती में रासायनिक खाद और ट्रैक्टरों के इस्तेमाल ने गौवंश की जरूरत सीमित कर दी है। सरकारें गोबर, गौमूत्र से खाद एवं कीटनाशक बनाने के कारखाने खोलें, गोबर गैस को बढ़ावा दें। जनता गाय का दूध खरीदे। फिर देखिए, गौवंश के अच्छे दिन आ जाएंगे। निस्संदेह आयुर्वेद दिव्य ज्ञान है। यह मनुष्य को प्रकृति के अनुकूल दिनचर्या रखने के साथ स्वस्थ जीवन के तरीके सिखाता है। जो लोग आयुर्वेद के अनुसार जीवन जीते हैं, वे काफी स्वस्थ रहते हैं। प्रकृति के विरुद्ध दिनचर्या एवं खानपान से रोग पैदा होते हैं। अगर हमारे ऋषियों का यह ज्ञान उपलब्ध होने के बावजूद लोग इसमें रुचि नहीं रखते, प्रकृति के विरुद्ध जीवन जीते हैं तो इसके लिए आयुर्वेद जिम्मेदार नहीं है।