एकजुट होकर आगे बढ़ने का समय

कोरोना काल में पैदा हुई चुनौती बहुत बड़ी थी

वर्तमान चुनौती उसकी तुलना में बहुत छोटी है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण उपजे हालात के बारे में जो टिप्पणी की है, उससे देश में एकता का संदेश गया है। प्रधानमंत्री ने सत्य कहा कि 'हम कोरोना के समय भी एकजुटता से ऐसी चुनौतियों का सामना कर चुके हैं।' वास्तव में कोरोना काल में पैदा हुई चुनौती बहुत बड़ी थी। वह महामारी का दौर था। हमने उस पर जीत हासिल की थी। वर्तमान चुनौती उसकी तुलना में बहुत छोटी है। इसमें संक्रमित होकर मृत्यु होने का जोखिम तो नहीं है। भारत सरकार राहत पहुंचाने के लिए अपने स्तर पर कोशिश कर रही है। देशवासी भी संयम और अनुशासन का पालन करें। इस समय कुछ नेताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसरों को अच्छा मौका मिल गया है। वे ईंधन की कमी का मुद्दा उठाकर केंद्र सरकार को घेर रहे हैं। एक इन्फ्लूएंसर जो खुद को गायिका भी बताती हैं, महंगी कार में घूमती हैं। उन्होंने खाली सिलेंडर के पास मिट्टी का चूल्हा बना लिया है। दरअसल वे यह दिखाना चाहती हैं कि सिलेंडर नहीं मिलने से बहुत मुश्किल हालात का सामना कर रही हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया पर मिट्टी के चूल्हे की फोटो ऐसे पोस्ट कर रहे हैं, जैसे इस पर खाना बनाना कोई भयंकर सजा हो। यह मुश्किल समय है, जो हमेशा नहीं रहेगा। यह भी बीत जाएगा। यह एकजुट होकर आगे बढ़ने का समय है। नेतागण और इन्फ्लूएंसर जनता का मनोबल न तोड़ें। अभी सोशल मीडिया पर जैसी सामग्री पोस्ट की जा रही है, उससे लोगों में घबराहट फैल रही है। जिसे गैस सिलेंडर की तुरंत जरूरत नहीं है, वह भी कतार में लग रहा है। जिसकी गाड़ी में पर्याप्त तेल है, वह भी टैंक फुल करवाने की कोशिश कर रहा है। क्या हम मुश्किल समय का ऐसे मुकाबला करेंगे?

भारत अपनी ईंधन संबंधी जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर है। वहां युद्ध छिड़ने पर पहले की तरह आपूर्ति नहीं हो सकती। हालांकि भारत सरकार ने बातचीत कर रास्ते खुलवाए हैं। अन्य देशों से संपर्क किया जा रहा है। ईंधन पहुंचने में समय लगता है। तब तक लोगों को धैर्य से काम लेना होगा। सरकार को चाहिए कि वह साइकिल के उपयोग को बढ़ावा दे। पूर्व में इस पर बातें तो खूब हुईं, लेकिन धरातल पर कोई खास असर दिखाई नहीं दिया। अगर हमारे देश में बेहतर साइकिलें बनाने के लिए शोध होता, बाजार में अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त और आकर्षक डिजाइनों वाली साइकिलें उपलब्ध होतीं तो लोगों को बहुत मदद मिलती। उन्हें अपने दोपहिया वाहन लेकर पेट्रोल पंप पर लंबी कतारों में खड़ा नहीं होना पड़ता। जितना प्रचार तेल से चलने वाले वाहनों का किया गया, उतना साइकिल का नहीं किया गया। भारत में सड़कों की स्थिति में बहुत सुधार हुआ है। उन्हें साइकिलों के लिए सुरक्षित बनाने की जरूरत है। यह एक ऐसा साधन है, जिसकी रफ्तार कम है, लेकिन यह जीवन को रुकने नहीं देगी। युवाओं के बीच इसे लोकप्रिय बनाना चाहिए। यूरोप में कई सुंदर डिजाइनों वाली साइकिलें चलन में हैं। वहां जो लोग साइकिलों का उपयोग करते हैं, उन्हें पर्यावरण का हितैषी समझा जाता है। कुछ कंपनियां तो ऐसे कर्मचारियों को आर्थिक प्रोत्साहन देती हैं, जो साइकिल से दफ्तर आते हैं। वहां साइकिल चलाने को किसी व्यक्ति की कमजोर आर्थिक स्थिति से जोड़कर नहीं देखा जाता और न ही उसकी प्रतिष्ठा में कोई कमी आती है। क्या हम अपने देश में ऐसा नहीं कर सकते? एक अध्ययन के अनुसार, अगर भारत में युवा जनसंख्या पांच किमी तक यात्रा के लिए साइकिल का उपयोग करे तो हर साल लगभग 1.8 लाख करोड़ रुपए की बचत हो सकती है। इसमें ईंधन और वाहन के खर्चों की बचत शामिल है। स्वास्थ्य पर होने वाले खर्चों की काफी बचत हो सकती है। पर्यावरण प्रदूषण में कमी आएगी, सो अलग। बस, हमें सोच बदलने की ज़रूरत है।

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