उत्तर प्रदेश पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती परीक्षा में एक प्रश्न के विकल्पों में 'पंडित' शब्द को गलत तरीके से प्रस्तुत करने की घटना अत्यंत निंदनीय है। उस प्रश्न को पढ़कर साफ पता चलता है कि उक्त विकल्प भूलवश शामिल नहीं हुआ है। यह जानबूझकर की गई हरकत है। इसके पीछे उस व्यक्ति की विकृत मानसिकता है। ब्राह्मणों के खिलाफ सदियों से नफरत का माहौल बनाया गया है। ऐसी गंदी मानसिकता रखने वालों के हौसले कितने बुलंद हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक निर्माता ने तो अपनी फिल्म का नाम ही 'घूसखोर पंडत' रख दिया था। बाद में उसका विरोध हुआ और उच्चतम न्यायालय से फटकार पड़ी तो नाम बदल दिया। इस पर भी कथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग असंतुष्ट था। उन्हें यह बदलाव कला पर आघात महसूस हुआ। क्या कोई निर्माता कला का ऐसा प्रयोग अन्य समुदायों के साथ कर सकता है? नहीं, क्योंकि अगर ऐसा किया तो उसे 'शोषक', 'जातिवादी' जैसी उपाधियों से विभूषित किया जाएगा। हां, ब्राह्मणों के खिलाफ कुछ भी लिखने, दिखाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाता है। सिनेमा में ऐसा शुरू से ही हो रहा है। कितनी ही फिल्में हैं, जिनमें ब्राह्मण को लालची, स्वार्थी और अहंकारी दिखाया गया है, जबकि इन बुराइयों का संबंध किसी जाति विशेष से नहीं है। बुरे लोग हर जाति में मिल जाएंगे। ब्राह्मणों के बारे में एक और बड़ा दुष्प्रचार हुआ है। कई लोग ऐसा मानते हैं कि ब्राह्मण कोई कामकाज नहीं करते, बस मुफ्त की रोटियां तोड़ते हैं, क्योंकि इनके पास रोजाना ही मंदिर से खूब चढ़ावा आ जाता है!
एआई के दौर में ऐसी सोच रखने वालों की बुद्धि पर तरस आता है। अगर ब्राह्मण कोई कामकाज नहीं करते हैं तो उनके घरों के खर्चे कौन चला रहा है? क्या इस महंगाई में कोई ऐसा दानवीर है कि एक जाति के लोग कोई काम न करें और वह उनकी रसोई से लेकर तमाम खर्चे उठाए? ब्राह्मण समाज के कितने लोग मंदिरों के पुजारी हैं? यह आंकड़ा इनकी कुल आबादी का दो प्रतिशत भी नहीं होगा। रही बात मंदिर से खूब चढ़ावा आने की, तो जहां ज्यादातर लोग दानपात्र में डालने के लिए छुट्टे पैसे टटोलते हैं, वहां इस दुष्प्रचार में कोई दम नहीं है। बड़े मंदिर के पुजारियों को बस सामान्य वेतन मिलता है। देशभर में हजारों मंदिर ऐसे हैं, जिनमें रंग-रोगन से लेकर भगवान की पोशाक, दीया-बत्ती तक का खर्च ब्राह्मण अपनी जेब से खुशी-खुशी वहन करता है। वह खुद को भगवान और उसके भक्तों का सेवक समझता है। अगर कोई भक्त आदरपूर्वक एक फल और पांच रुपए भी भेंट कर दे तो उसे दिल खोलकर आशीर्वाद देता है। सैनिक, शिक्षक, चिकित्सक से लेकर विधायक, सांसद, मंत्री, प्रधानमंत्री, न्यायाधीश और राष्ट्रपति अपने-अपने पदों पर देश की सेवा करते हैं। इन्हें कई सुविधाएं मिलती हैं। ये अच्छा-खासा वेतन भी पाते हैं। वहीं, गांव के एक छोटे-से मंदिर में किसी गरीब ब्राह्मण को दक्षिणा में पांच रुपए मिल जाएं तो कई लोगों को वे अखरने लगते हैं। उन्हें लगता है कि 'इतनी बड़ी राशि' मुफ्त में लुटाई जा रही है। मौजूदा व्यवस्था में ढेरों खामियों के बावजूद ब्राह्मणों के कई बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। दुनिया की बड़ी कंपनियां उनकी प्रतिभा का लोहा मानती हैं। कुछ लोगों को यह भी नहीं सुहाता। वे चाहते हैं कि हर समस्या के लिए ब्राह्मणों को जिम्मेदार ठहराया जाए। वे उनमें सदैव खोट ढूंढ़ते रहते हैं। उन्हें लगता है कि ब्राह्मणों के बारे में जितना अनर्गल बोलेंगे, उतने ही बड़े प्रगतिशील और बुद्धिजीवी कहलाएंगे। उत्तर प्रदेश पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती परीक्षा में पूछा गया प्रश्न भी इसी मानसिकता का नमूना है। सरकारों को ऐसी प्रवृत्ति को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। किसी की सहनशीलता को उसकी कमजोरी नहीं समझना चाहिए। बार-बार एक ही समुदाय को निशाने पर लेने के नतीजे भविष्य में शुभ फलदायक नहीं होंगे।