एकजुट होकर चुनौती का सामना करें

क्या ईरान के खिलाफ खड़ा हो गया भारत?

इजराइल और ईरान, दोनों के साथ भारत के संबंध अच्छे हैं

लोकतंत्र में सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष की भी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं। एक बड़ी जिम्मेदारी यह है कि जब देश के सामने कोई चुनौती आए तो सारे मतभेद भुला दें और सरकार एवं नागरिकों के साथ मिलकर काम करें। इससे देश की ताकत बढ़ती है। चुनौती पर जल्दी जीत हासिल होती है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस बात से बिल्कुल ही अनभिज्ञ हैं। उन्होंने ईरान के इजराइल-अमेरिका से युद्ध और भारत में रसोई गैस सिलेंडरों की उपलब्धता के बारे में जो बयान दिया है, वह हकीकत से परे है। केजरीवाल केंद्र सरकार की खूब आलोचना करें। यह उनका अधिकार है, लेकिन एक वरिष्ठ राजनेता के तौर पर उनकी जिम्मेदारी है कि वे सच बोलें। केजरीवाल कहते हैं, 'वे (प्रधानमंत्री) जाकर सीधे इजराइल और अमेरिका के साथ तथा ईरान के खिलाफ खड़े हो गए।' क्या प्रधानमंत्री जब विदेश जाकर उनके शीर्ष राजनेताओं से मुलाकात करते हैं तो इसका यह मतलब है कि वे अन्य देशों के खिलाफ खड़े हो गए? यह कैसा तर्क है? विभिन्न देशों के साथ मधुर संबंध रखना विदेश नीति का अनिवार्य हिस्सा है। प्रधानमंत्री मोदी पूर्व में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिल चुके हैं। इन मुलाकातों को कौनसे देश के खिलाफ माना जाएगा? जब दो देशों के शीर्ष राजनेता इस तरह मिलते हैं तो वे अपनी निजी दोस्ती निभाने के लिए नहीं मिलते। उनके लिए अपने देशों के हित ही सर्वोच्च होते हैं। इजराइल और ईरान, दोनों के साथ भारत के संबंध अच्छे हैं। ईरान के पास तेल और गैस हैं, इजराइल के पास उन्नत तकनीक है। वहां बड़ी संख्या में भारतीय नौकरी करते हैं। अगर भारत को तेल और गैस की तथा ईरान को खाद्यान्न की जरूरत हो, तो क्या दोनों देश इस वजह से बातचीत न करें, क्योंकि इजराइल नाराज हो जाएगा? अगर भारत को अत्याधुनिक ड्रोन की और इजराइल को प्रतिभाशाली इंजीनियरों की जरूरत हो, तो क्या दोनों देश इस वजह से बातचीत न करें, क्योंकि ईरान को बुरा लगेगा?

केजरीवाल का यह कथन भी समझ से परे है- '(प्रधानमंत्री मोदी को) युद्ध शुरू होने से एक दिन पहले इजराइल जाने की क्या जरूरत थी? युद्ध शुरू होने से एक दिन पहले नेतन्याहू को गले लगाने की क्या जरूरत थी? ऐसा करके उन्होंने पूरे देश को संकट में डाल दिया।' क्या इजराइल और ईरान के शीर्ष राजनेता युद्ध करने से पहले, भारतीय प्रधानमंत्री को चिट्ठियां लिखते हैं? इन दोनों देशों के संबंध दशकों से खराब हैं। इनके नेता एक-दूसरे के खिलाफ आग उगलते रहते हैं। इनके सैन्य अधिकारी एक-दूसरे को ललकारते रहते हैं। अगर ये अपने हर बयान पर कायम रहते तो अब तक एक-दूसरे को दुनिया के नक्शे से मिटा चुके होते! किसे पता था कि दोनों देशों में भिड़ंत हो ही जाएगी? किसने सोचा होगा कि खामेनेई की हत्या कर दी जाएगी? कौन जानता था कि हमास इजराइल के नागरिकों पर बहुत घातक हमला करेगा? इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद, जिसके कारनामों की काफी चर्चा होती है, वह भी हमास के मंसूबों को नहीं भांप पाई थी। दुनिया में हर घटना का हमेशा सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता। केजरीवाल कह सकते हैं कि नेतन्याहू को गले लगाने से भारत में ईंधन की समस्या आई है। क्या ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान को गले लगाते तो गैस सिलेंडरों के जहाज भर-भरकर आते? ऐसा नहीं है। उस स्थिति में भी ये दोनों देश लड़ते और नतीजा यही निकलता। ऐसा न समझें कि प्रधानमंत्री मोदी ईरान की खुलकर हिमायत करते तो भारत में रसोई गैस संबंधी कोई समस्या नहीं होती। क्या होता अगर ईरान हमारे जहाजों की सुरक्षित निकासी का वचन देता, लेकिन अमेरिका उन पर हमला कर देता? युद्ध में ऐसी घटनाएं हो सकती हैं। उस स्थिति में अमेरिका अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय पूरा मलबा ईरान या किसी उग्रवादी संगठन पर डाल सकता था। तब केजरीवाल यह कहकर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते कि 'क्या जरूरत थी मसूद पेज़ेशकियान को गले लगाने की? अगर ट्रंप से मिलते तो हमारे जहाज सुरक्षित होते!' दुनिया में अनिश्चितता हमेशा रहेगी। हमारे चाहने मात्र से न तो नेतन्याहू ईरान को आम भेजेंगे और न वहां से उनके लिए गुलाब आएंगे। हमें हर घटना के अनुभव से शिक्षा लेते हुए अपने देश के भविष्य को सुरक्षित बनाने पर जोर देना चाहिए। एकजुट होकर चुनौती का सामना करना चाहिए।

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