जब से इजराइल-अमेरिका का ईरान से युद्ध शुरू हुआ है, भारत में कुछ लोग अति-उत्साहित होकर टिप्पणियां कर रहे हैं। वे खामेनेई की मौत पर भावुक हैं और शोक प्रकट कर रहे हैं। उन्हें इसका पूरा अधिकार है, बशर्ते भारत की शांति में कोई खलल न पड़े। विपक्षी दल जनभावनाओं को उकसाते हुए पूछ रहे हैं- 'भारत क्यों खामोश है ... भारत कोई कदम क्यों नहीं उठा रहा है?' ध्यान रखें, यह युद्ध है, कोई वीडियो गेम नहीं है। भारत खामोश नहीं है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ईरानी दूतावास का दौरा कर खामेनेई की मौत पर शोक व्यक्त किया है। जहां तक 'कोई कदम' उठाने का सवाल है तो उसे स्पष्ट करने की जरूरत है। क्या विपक्षी दल और जनता का एक वर्ग यह चाहते हैं कि भारत को इस युद्ध में कूद जाना चाहिए? क्यों कूदे भारत? जो देश लड़ रहे हैं, उनकी दशकों पुरानी दुश्मनी है। वे एक-दूसरे पर अशांति और आतंकवाद फैलाने के गंभीर आरोप लगाते हैं। दोनों तरफ ही आरोपों की सूची बहुत लंबी है। हालांकि इन देशों के साथ भारत के संबंध अच्छे हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि किसी एक का हिमायती बनकर अखाड़े में कूद पड़ें। क्या ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ईरान ने हमारे साथ मिलकर पाकिस्तान पर धावा बोला था? क्या अमेरिका ने भारत का सहयोग किया था? क्या इजराइल ने कोई सैन्य टुकड़ी भेजी थी? इन सबका जवाब है- नहीं। भारत अपनी सीमाओं और नागरिकों की सुरक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। उक्त तीनों देश भी ऐसा ही दावा बार-बार दोहरा चुके हैं। जब कोई देश मदद मांग नहीं रहा है तो हमें 'मान न मान, मैं तेरा मेहमान' बनने की क्या जरूरत है? युद्धकाल में किसी एक पक्ष की मदद करने का मतलब होता है- दूसरे पक्ष से दुश्मनी मोल लेना। क्या ऐसा करना भारत के हित में होगा? क्या विपक्षी दल यह चाहते हैं कि भारत इस युद्ध में शामिल हो, जिसके बाद उन्हें सरकार को कोसने का मौका मिले?
यहां भारत से आशय है- 140 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या। इतने लोगों की सुरक्षा करना, उनकी जरूरतों का ध्यान रखना कोई मामूली बात नहीं है। भारत सरकार पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। विदेश नीति कोई स्कूल की यारी-दोस्ती नहीं होती, जिसमें कुछ लड़के एक-दूसरे के लिए जान की बाजी लगा देने की कसमें खाते हैं। जिम्मेदार सरकारों को कई चीजें देखकर चलना और बोलना होता है। वर्तमान परिस्थितियों में यह सुनिश्चित करना ही भारत सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि ईरान और उसके आस-पास स्थित देशों में भारतीय नागरिक सुरक्षित हों और अपने देश में ईंधन की कोई कमी न हो। गैस सिलेंडर की कीमतों में भी बढ़ोतरी की गई है। आश्चर्यजनक रूप से, जो विपक्षी दल पहले यह मांग कर रहे थे कि भारत को इजराइल-अमेरिका के खिलाफ कदम उठाना चाहिए, अब वे हंगामा खड़ा कर रहे हैं कि सरकार ने महंगाई बढ़ा दी। सोचिए, जब भारत इस युद्ध से दूर है, तब इसका आर्थिक भार महसूस हो रहा है, अगर देश खुलकर किसी का पक्ष लेता तो यह भार कितना होता? महंगाई बहुत बढ़ जाती। फिर मुफ्त राशन, मुफ्त चिकित्सा, शिक्षा, आर्थिक सहायता जैसी योजनाएं भूल जाएं! आज जो लोग कोरी भावुकतापूर्ण बातें कर केंद्र सरकार को आड़े हाथों ले रहे हैं, उस स्थिति में वे ही यह कहते हुए कड़ी आलोचना करते कि 'महंगाई ने कमर तोड़ दी, सरकार को पराई पंचायती में हीरो बनने की क्या जरूरत थी?' इस युद्ध से उपजे हालात से सबक लेते हुए भारत सरकार को एक काम जरूर करना चाहिए। हमारे देश के पास पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस का कोई उचित विकल्प होना चाहिए। अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भरता में भारी जोखिम है। भारत को इस क्षेत्र में पूर्णत: आत्मनिर्भर बनना होगा। इस चुनौती को स्वीकार करना ही होगा। भारत के पास प्रतिभाशाली वैज्ञानिक हैं। अगर वे ठान लें तो ऐसा करके दिखा सकते हैं। इस समय केंद्र सरकार को अडिग रहना चाहिए। विपक्षी दलों और जनता को भी सरकार का साथ देना चाहिए।