कर्नाटक सरकार ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के संबंध में जो घोषणा की है, उसका स्वागत होना चाहिए। मुख्यमंत्री सिद्दरामय्या द्वारा बजट पेश करते हुए की गई इस घोषणा में एक अभिभावक की चिंता झलकती है। पिछले एक दशक में सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग ने विभिन्न समस्याओं को जन्म दिया है। कई बच्चे पांच मिनट का नाम लेकर मोबाइल फोन लेते हैं, फिर घंटों सोशल मीडिया देखते हैं। इससे उनकी पढ़ाई और सेहत, दोनों को नुकसान होता है। कई बच्चों की आदतें बिगड़ गई हैं। पहले, वे समय पर पढ़ाई करते थे, खेलकूद संबंधी गतिविधियों में भाग लेते थे और घर के कामकाज में भी हाथ बंटाते थे। उन्हें जब से मोबाइल फोन की लत लगी है, उनका जीवन सोशल मीडिया तक सीमित हो गया है। जब उन्हें पढ़ाई के लिए कहा जाता है तो वे बहाने ढूंढ़ते हैं। उन्हें लगता है कि दिनभर मोबाइल फोन के साथ व्यस्त रहना दुनिया का सबसे जरूरी काम है और अगर ऐसा नहीं किया तो धरती का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। बच्चे मासूम होते हैं। उन्हें पता नहीं है कि इस आदत से भविष्य में बड़ा नुकसान हो सकता है। उनका बचपन खुशहाल हो, भविष्य उज्ज्वल हो, इसके लिए थोड़ी सख्ती जरूरी है। आज उन्हें कुछ असुविधा हो सकती है, बुरा भी लग सकता है, लेकिन कुछ साल बाद वे इस फैसले के लिए सिद्दरामय्या के आभारी होंगे। इससे पहले, आंध्र प्रदेश सरकार बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर चिंता जता चुकी है। ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने भी बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग प्रतिबंधित करने के संबंध में सख्त कदम उठाए हैं।
बच्चों को खेलकूद के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उनके लिए अच्छी किताबें और ज्ञानवर्द्धक पत्रिकाएं उपलब्ध होनी चाहिएं। उन्हें जन्मदिन जैसे शुभ अवसरों पर मोबाइल फोन की जगह ऐसी चीजें लाकर दें, जो उनमें जिज्ञासा पैदा करें। प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के बारे में कहा जाता है कि जब वे छोटे थे तो बीमार पड़ गए थे। उस समय उनके पिता ने उन्हें कुतुबनुमा लाकर दिया था। इससे उनके मन में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा पैदा हुई थी। सोचिए, अगर उस समय सोशल मीडिया का चलन होता और आइंस्टीन के पिता उन्हें मोबाइल फोन लाकर दे देते तो उनके सोचने की दिशा क्या होती? बच्चे जिन चीजों के साथ ज्यादा समय बिताते हैं, उनका मन पर गहरा असर होता है। कोई बच्चा मिट्टी के घरौंदे बनाता है, किसी को कागज के हवाईजहाज उड़ाना पसंद होता है, कोई पुराने डिब्बों से ट्रक बनाता है, कोई बारिश के मौसम में कागज की नाव बनाकर मन बहलाता है। प्रकृति ने बच्चों में यह अद्भुत क्षमता पैदा की है। छोटा बच्चा कई सवाल पूछता है। वह इस दुनिया को जानना चाहता है। अगर उसे उचित समय पर उचित जानकारी देने वाले स्रोत मिल जाएं तो उसका भविष्य बहुत उज्ज्वल हो सकता है। क्या सोशल मीडिया ऐसा कर रहा है? कोरोना काल के बाद तो सोशल मीडिया पर अभद्र एवं आपत्तिजनक सामग्री की बाढ़-सी आ गई है। उसे देखकर बच्चे क्या सीखेंगे? क्या ऐसी सामग्री उन्हें चरित्रवान नागरिक बनाएगी? बच्चों को सोशल मीडिया के भरोसे छोड़ देना कितना सुरक्षित है? इन सभी सवालों पर सरकारों को विचार करना होगा। बच्चों को अनुकूल वातावरण और सही दिशा देने की जिम्मेदारी सबकी है। जिन चीजों का बच्चों के मन पर गलत असर पड़े, वे घर और समाज में न हों अथवा उनका दायरा इतना सीमित हो कि बच्चे उन तक पहुंच न सकें। आज सोशल मीडिया इसी श्रेणी में आ चुका है। अगर अन्य आयु वर्ग के लोग भी इसका उपयोग सीमित रखें तो बच्चों में अच्छा संदेश जाएगा।