देवेंद्र शर्मा बनारस से
बनारस/दक्षिण भारत। रेलवे संस्थान हमारे देश के लिए परिवहन क्षेत्र में रीढ़ की हड्डी के समान है। रेलगाड़ी को चलाने के लिए इंजन बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1961 में बनारस रेल इंजन कारखाना (बरेका) की स्थापना की गई थी। रेलवे को चलायमान रखने के लिए बरेका संस्थान की अहम भूमिका है। बरेका प्रतिदिन औसतन 1.8 (2) इंजन का निर्माण कर रहा है। इस वित्तीय वर्ष के लिए 553 इंजनों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, जिसमें से बरेका में अब तक 523 इंजन निर्मित किए जा चुके हैं। इस मार्च के अंत तक पूरा लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा। बनारस में 300 हेक्टेयर में फैले बनारस रेल इंजन कारखाने में 3,000 से अधिक लोग कार्यरत हैं।
भारत सरकार के डेवलपमेंट कम्युनिकेशन एंड इंफॉर्मेशन डिसेमिनेशन कार्यक्रम के अंतर्गत जनकल्याणकारी नीतियों, विकासपरक योजनाओं एवं आधारभूत अवसंरचना सुदृढ़ीकरण की उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के उद्देश्य से पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की ओर से 10 सदस्यीय विशेष मीडिया टीम ने बनारस रेल इंजन कारखाना (बरेका) का विस्तृत भ्रमण किया। पीआईबी बेंगलूरु की सहायक निदेशक करिश्मा पंत के नेतृत्व में कर्नाटक से आए प्रमुख मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधियों ने बरेका का भ्रमण किया और बरेका की लोकोमोटिव निर्माण प्रक्रिया, तकनीकी उत्कृष्टता, नवाचार, गुणवत्ता मानकों तथा वैश्विक निर्यात उपलब्धियों का प्रत्यक्ष जायज़ा लिया।
सबसे पहले बरेका के जनसंपर्क अधिकारी राजेश कुमार तथा मुख्य विद्युत इंजीनियर/लोको अरविंद कुमार जैन के मार्गदर्शन में पत्रकारों ने लोको फ्रेम शॉप, लोको असेंबली शॉप एवं लोको टेस्ट शॉप का दौरा कर जानकारियां प्राप्त की। पत्रकारों ने बरेका द्वारा निर्मित उन्नत विद्युत लोकोमोटिव, यात्री वाहक इलेक्ट्रिक लोको, माल वाहक इलेक्ट्रिक लोको एवं अमृत भारत लोको की निर्माण प्रक्रिया का गहन अध्ययन किया। साथ ही गैर-रेलवे ग्राहकों हेतु निर्मित किए जा रहे डीजल लोकोमोटिव के उत्पादन कार्यों की जानकारी ली। बदलते समय के साथ, डीजल इंजनों का उत्पादन बंद कर दिया गया है। बरेका में भारतीय रेलवे के लिए केवल इलेक्ट्रिक इंजन ही बनाए जा रहे हैं।
पत्रकारों ने लोको कैब की आधुनिक सुविधाओं, चालक-अनुकूल एर्गोनॉमिक डिजाइन, डिजिटल नियंत्रण प्रणाली एवं उन्नत सुरक्षा प्रावधानों का सूक्ष्म अवलोकन किया। कारखाना भ्रमण के दौरान उप मुख्य विद्युत इंजीनियर/लोको सुदीप रावत ने तकनीकी प्रक्रियाओं एवं गुणवत्ता आश्वासन प्रणाली के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी प्रदान की।उन्होंने बताया कि एक इंजन में बिछाए गए तार की लंबाई 11 किलोमीटर दूरी की होती है है। उन्होंने बताया कि एक इंजन के लिए इतनी बड़ी मात्रा में तार की आवश्यकता होती है और इस तार एसेम्बली को तैयार करने में महिला कर्मचारियों की विशेष भूमिका होती है।
महाप्रबंधक आशुतोष पंत ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि इस साल अप्रैल में रेलवे लोकोमोटिव फैक्ट्री से निकलने वाले सभी ट्रेन इंजन ’कवच’ दुर्घटना सुरक्षा प्रणाली से लैस होंगे, जो ट्रेन दुर्घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। ‘कवच’ एक स्वदेशी स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली है। इसे ट्रेन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है। रेडियो फ्रीक्वेंसी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग करते हुए, यह स्वचालित रूप से ब्रेक लगाकर ट्रेन को रोक देती है। उन्होंने बताया कि बरेका भारतीय रेल की बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी तकनीकी विश्वसनीयता स्थापित कर चुका है। इंजनों के निर्यात के बारे में बताते हुए पंत ने कहा कि विशेष रूप से बरेका द्वारा अब तक मोज़ाम्बिक सहित 11 देशों को 182 डीजल लोकोमोटिव का सफल निर्यात किया जा चुका है और यह उपलब्धि ’मेक इन इंडिया-मेक फॉर दि वर्ल्ड’ की संकल्पना को साकार रूप देने का सशक्त उदाहरण है।
कारखाने के विद्युत अभियंता एसके श्रीवास्तव ने बताया कि एक इंजन बनाने में करीब 10.30 करोड़ रुपए का खर्च आता है। एक इंजन का अधिकतम उपयोग 36 वर्षों तक किया जा सकता है। इस अवसर पर प्रमुख मुख्य विद्युत इंजीनियर सुशील कुमार श्रीवास्तव, प्रमुख मुख्य यांत्रिक इंजीनियर विवेक शील, मुख्य जनसम्पर्क अधिकारी सागर तथा जनसंपर्क अधिकारी राजेश कुमार एवं अन्य अधिकारी उपस्थित थे।