केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पंजाब में धर्मांतरण का मुद्दा उठाकर देशवासियों को एक बड़ी समस्या से सावधान किया है। धर्मांतरण कई समस्याओं को जन्म देता है। वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के पीछे एक बड़ा कारण सदियों से हो रहा धर्मांतरण था। कश्मीर में धर्मांतरण हुआ, जिसका नतीजा हमारे सामने है। पंजाब में हो रहा धर्मांतरण भविष्य में गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकता है। इस राज्य के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा लगती है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान स्थित है। यहां उग्रवाद की समस्या रही है, जिसके पीछे पाकिस्तान का हाथ था। पड़ोसी देश आज भी प्रतिबंधित संगठनों को हथियार, धन, ड्रग्स जैसी चीजें पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। यहां धर्मांतरण का खेल अन्य राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा घातक सिद्ध हो सकता है। पंजाब में ऐसे संगठनों ने जड़ें जमाने के लिए कई पैंतरे आजमाए हैं। ये किसी व्यक्ति को न तो पहनावा बदलने के लिए कहते हैं, न नाम बदलने पर जोर देते हैं, न भाषा के स्तर पर बदलाव की बात करते हैं। यहां तक कि धर्मांतरण को धर्मांतरण भी नहीं कहते हैं। ये इसे 'मन परिवर्तन', 'प्रभु की शरण' आदि कहते हैं, जिससे व्यक्ति को असहज महसूस नहीं होता। 'चंगाई सभा' नामक आयोजन भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसा दावा किया जाता है कि जो व्यक्ति इसमें आता है, वह गंभीर बीमारियों से मुक्ति पाता है। सोशल मीडिया पर कई लोगों के वीडियो मौजूद हैं, जिनमें वे 'गवाही' देते हुए बताते हैं कि 'पहले हम बहुत बीमार, दु:खी और परेशान थे ... चंगाई सभा में जाने के बाद हमारे तो दिन ही फिर गए, तकलीफों से निजात मिल गई।' हालांकि चिकित्सक ऐसे दावों पर सवाल उठा चुके हैं।
बड़ा सवाल है- लोग धर्मांतरण के लिए क्यों तैयार हो जाते हैं? इसके कई जवाब हो सकते हैं। अगर सभी कारणों को मिलाकर कोई एक जवाब दिया जाए तो वह होगा- धर्मांतरण कराने वाले संगठन उन्हें उम्मीद दिखाते हैं। अगर कोई व्यक्ति जरूरतमंद होता है तो उसकी कुछ मदद कर देते हैं। जहां पढ़ाई-लिखाई की अच्छी व्यवस्था नहीं होती, वहां अंग्रेजी माध्यम का स्कूल खोल देते हैं। ये व्यक्ति को भरोसा दिलाते हैं कि एक बार 'शरण' में आने के बाद आपकी ज़िंदगी बदल जाएगी। पंजाब के कई लोग विदेश, खासकर कनाडा जाकर नौकरी करने के इच्छुक हैं। जब वे ऐसे संगठनों के संपर्क में आते हैं तो उन्हें लगता है कि धर्मांतरण से उनका रास्ता आसान हो जाएगा। उन्हें दस्तावेजों में कुछ भी बदलाव नहीं करना होता। वे अपनी पुरानी पहचान के साथ नई आस्था के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों की गवाहियां मौजूद हैं, जिन्होंने कहा कि पहले उनका वीजा नहीं लग रहा था, 'शरण' में आते ही काम हो गया! धर्मांतरण संबंधी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए रेडियो का भरपूर इस्तेमाल किया गया। ऐसे रेडियो स्टेशन शुरू किए गए, जो रोचक अंदाज में देश-दुनिया का हाल बताते, हिंदी-पंजाबी में गाने सुनाते और धर्मांतरण के पक्ष में माहौल बनाते थे। अब यह काम इंटरनेट के जरिए हो रहा है। एक रेडियो स्टेशन, जो ढाई दशक पहले बहुत मशहूर था, इसी तर्ज पर काम करता था। जो श्रोता उस स्टेशन को पत्र लिखता, उसे मुफ्त किताबें भेजी जाती थीं। जब किसी व्यक्ति को मुफ्त किताबें मिलतीं तो वह अन्य लोगों को जरूर बताता था। इस योजना से वे भी आकर्षित होते और पत्र लिखकर अपने लिए किताबें मंगाते थे। फिर, यह सिलसिला आगे बढ़ता जाता था। धर्मांतरण कराने वाले संगठन हर आयु वर्ग की जरूरत और रुचि को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनाते हैं। उन पर लगाम लगाने के लिए कानूनी उपाय पर्याप्त साबित नहीं होंगे। सरकारों को स्कूलों और अस्पतालों की हालत सुधारनी होगी। परिवारों को चाहिए कि वे अपने बच्चों को धार्मिक शिक्षा भी दें। सामाजिक स्तर पर भेदभाव को दूर करें। सद्भाव और एकता को मजबूत करें।