फर्जी धमकियों का असली मकसद

इनके निशाने पर स्कूल क्यों हैं?

सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता

इन दिनों देश के विभिन्न शहरों में स्कूलों और संस्थानों को बम की धमकी के जो ईमेल मिल रहे हैं, उनसे संबंधित स्थानों पर अफरा-तफरी मच रही है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। साल 2024 में भी ऐसी धमकियां बहुत मिली थीं। यह सिलसिला आज तक जारी है। इनका तरीका भी लगभग एक जैसा है। प्राय: स्कूलों को ईमेल भेजकर दहशत फैलाने की कोशिश की जाती है। इन धमकियों के बाद स्कूल परिसर खाली कराए जाते हैं, पुलिस और बम निरोधक दस्ते के अधिकारी जांच करते हैं, लेकिन कुछ भी संदिग्ध नहीं मिलता है। हो सकता है कि ये ईमेल किसी आतंकवादी संगठन ने भेजे हों या किसी खुराफाती की शरारत हो। सवाल है- इनके निशाने पर स्कूल क्यों हैं? स्कूलों में बड़ी संख्या में शिक्षक और बच्चे होते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि स्कूल को ऐसी धमकी मिली है तो डर का माहौल बनता है। वे अपने घर जाते हैं तो परिवार के सदस्यों, दोस्तों और पड़ोसियों को भी बताते हैं। इससे डर और ज्यादा फैलता है। लोग सोचते हैं कि 'आतंकवादियों पर किसी का नियंत्रण नहीं है, वे कुछ भी कर सकते हैं।' यही इन धमकियों का मकसद है। ज्यादा से ज्यादा लोगों को डराना, उनके बीच आतंकवाद से संबंधित चर्चा को बढ़ावा देना - यही तो वे चाहते हैं। ये धमकियां भेजने के लिए ईमेल पता तलाशना कोई मुश्किल काम नहीं है। आजकल हर बड़े स्कूल की वेबसाइट होती है। अगर वह न हो तो सोशल मीडिया पेज जरूर होता है। किसी दूर देश में बैठकर वहां ईमेल पता मालूम करना और उस पर धमकी भेजना मुश्किल काम नहीं है। स्कूल, प्रशासन और मीडिया को एक बात समझनी होगी। जब कभी किसी स्कूल को धमकी मिलती है तो उसके द्वारा सूचना पुलिस को भेजी जाती है। यह बात स्कूल के शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों तक भी पहुंचती है। कुछ समय बाद पुलिस आ जाती है। तब तक मामला समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर छा जाता है।

जब विदेश में कहीं बैठकर आतंकवादी या खुराफाती लोग ये खबरें पढ़ते होंगे तो क्या सोचते होंगे? वे निश्चित रूप से हंसते होंगे। वे कहते होंगे कि 'भारत में दहशत फैलाना बहुत आसान है। सिर्फ एक ईमेल करना है और हम टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक सब जगह छा जाएंगे!' इस चक्र को तोड़ना होगा। इन धमकियों का सिलसिला अभी बंद होने वाला नहीं है। ऐसी हर धमकी को गंभीरता से लेना चाहिए, लेकिन समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर जैसा माहौल बनता है, उससे बचना चाहिए। इसके लिए स्कूल और प्रशासन में संवाद होना चाहिए। जिस स्कूल के पास ऐसा ईमेल आए, वह प्रशासन को सूचना दे, लेकिन शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के साथ जानकारी साझा करते हुए संयम बरते। परिसर को खाली कराते समय बच्चों को धमकी के बारे में न बताएं। शिक्षकों और कर्मचारियों से भी कहें कि वे घबराहट में कोई प्रतिक्रिया न दें। हर स्कूल को महीने में एक-दो बार भूकंप, अग्नि सुरक्षा आदि के लिए अभ्यास करना चाहिए। पुलिस अधिकारियों को बुलाकर साइबर सुरक्षा, यातायात नियमों का पालन जैसे विषयों पर चर्चा की जा सकती है। सावधानी बरतना अपनी जगह ठीक है। इससे डर का माहौल पैदा नहीं होना चाहिए। जब लोगों में डर फैलता है तो आतंकवादियों और खुराफाती तत्त्वों का दुस्साहस बढ़ता है। वे अगली बार दुगुनी ऊर्जा से नए ईमेल पते खोजते हैं और धमकियां भेजते हैं। उसके बाद जब मामला चैनलों और सोशल मीडिया पर आता है तो उन्हें लगता है कि यह तरीका काम कर रहा है। इस पर विराम लगाने के लिए स्कूल, प्रशासन और मीडिया को संयम से काम लेना होगा। सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता, लेकिन अपनी सूझबूझ से देशविरोधी तत्त्वों के मंसूबों को नाकाम जरूर किया जा सकता है।

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