सुविधाओं के आदी न हो जाएं नौनिहाल

अत्यधिक निर्भरता नुकसानदेह हो सकती है

उन्हें प्रकृति के साथ जीना भी सिखाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम की दूसरी कड़ी में विद्यार्थियों को दी गई यह सलाह अत्यंत उपयोगी है कि 'खुद को प्रौद्योगिकी का गुलाम न बनाएं, इसका उपयोग क्षमता बढ़ाने में करें।' वैज्ञानिक उन्नति के दौर में कई विद्यार्थी प्रौद्योगिकी पर पूरी तरह निर्भर हो गए हैं। यह प्रवृत्ति उनके विकास में बाधक बन सकती है। अब हर मोबाइल फोन में कैलकुलेटर है। कई विद्यार्थी गणित के सवाल हल करते समय खुद गणना करने के बजाय कैलकुलेटर की मदद ले रहे हैं। जो विद्यार्थी लंबी अवधि तक ऐसा करते हैं, वे गणना एवं विश्लेषण में पिछड़ सकते हैं। नब्बे के दशक में जब बाजारों में विभिन्न प्रकार के कैलकुलेटर उपलब्ध होने लगे थे, तब कुछ विद्यार्थी उत्सुकतावश पढ़ाई में उनका इस्तेमाल करते थे। धीरे-धीरे उन्हें इसकी आदत हो गई। अगर कोई विद्यार्थी हफ्तेभर पढ़ाई के दौरान कैलकुलेटर पर ही निर्भर रहे और उसके बाद खुद गणना की कोशिश करे तो उसे बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। अब फोन में कैलकुलेटर के साथ एआई प्लेटफॉर्म भी हैं, जो हर सवाल का जवाब सेकंडों में देते हैं। इनसे जानकारी जरूर मिल जाती है, लेकिन ये विद्यार्थियों की रचनात्मकता और कौशल में कितनी वृद्धि करते हैं? छठी कक्षा के एक विद्यार्थी को गृहकार्य में किसी विषय पर निबंध लिखने के लिए कहा गया। उसने अपने दिमाग पर जोर डालने के बजाय मोबाइल फोन में एक एआई प्लेटफॉर्म खोला और निबंध का विषय उस पर टाइप कर दिया। पलक झपकते ही उसके सामने पूरा निबंध तैयार था। उसने वही लिख दिया।  

सवाल है- जब परीक्षा में किसी अन्य विषय पर निबंध लिखने के लिए कहा जाएगा तो वह विद्यार्थी कैसे लिखेगा? वहां तो मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं होगी! क्या इस पर निर्भरता से प्रदर्शन कमजोर नहीं होगा? जब यह विद्यार्थी दसवीं कक्षा में पहुंचेगा, तब उसका प्रदर्शन कैसा होगा? सर्च इंजन, एआई और अन्य ऐप्स की उपयोगिता है, लेकिन उन पर अत्यधिक निर्भरता नुकसानदेह हो सकती है। इन्हें अपनी बुद्धि और विवेक का स्थान नहीं देना चाहिए। इनके जरिए अपने कौशल में सुधार लाएं। इन्हें सवाल पूछने के लिए कहें और खुद जवाब दें। इस तरह विद्यार्थी अपने ज्ञान की परख कर सकते हैं। परीक्षा से कुछ दिन पहले एआई प्लेटफॉर्म पर किया गया अभ्यास काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। कुछ बच्चे खाना खाते समय भी मोबाइल फोन के साथ व्यस्त रहते हैं। वहीं, कुछ बच्चे उस समय टीवी देखना पसंद करते हैं। वे दस-पंद्रह मिनट में खाना खा लेते हैं। उसके बाद उनकी नजरें स्क्रीन पर जमी रहती हैं। उन्हें घंटाभर बाद याद आता है कि काफी समय बीत गया। कुछ बच्चे अन्य सुविधाओं के आदी हो जाते हैं। अगर उन्हें 200 मीटर दूर भी जाना हो तो पैदल चलने से परहेज करते हैं। वे गर्मियों में एसी के बिना नहीं रह सकते। उन्हें मटके का पानी अच्छा नहीं लगता। वे रेफ्रिजरेटर का बिल्कुल ठंडा पानी पीना पसंद करते हैं। यह आदत सेहत के लिए भी ठीक नहीं है। जब किसी कारणवश उन्हें ये सुविधाएं नहीं मिलती हैं तो बहुत परेशानी महसूस करते हैं। दिल्ली के एक महंगे स्कूल में पढ़ने वाला लड़का जब राजस्थान के अलवर में अपने ननिहाल आया तो अपनी नानी से शिकायत करने लगा, 'आपने मुझे यहां बुलाकर मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी!' वजह- ननिहाल में एसी, रेफ्रिजरेटर, कार जैसी सुविधाएं नहीं थीं। बच्चों को सुविधाएं जरूर दें। उन्हें प्रकृति के साथ जीना भी सिखाएं। कहीं ऐसा न हो कि बच्चे सुविधाओं के इतने आदी हो जाएं कि उनमें मेहनत करने और परिस्थितियों से जूझने का साहस ही न रहे।

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