राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जनसंख्या असंतुलन के लिए जिम्मेदार तीन प्रमुख कारकों - धर्मांतरण, घुसपैठ और कम जन्म दर - का उल्लेख कर एक बड़ी समस्या से आगाह किया है। पिछले 300 वर्षों में भारत के जिन इलाकों में जनसंख्या असंतुलन हुआ, वहां सद्भाव खतरे में पड़ा, जिसका नतीजा विभाजन के रूप में सामने आया। धर्मांतरण को सिर्फ सरकारों के भरोसे नहीं रोका जा सकता। हिंदू समाज को अपने अंदर चेतना जगानी होगी। 'मैं' और 'मेरा' से ऊपर उठकर 'हम' और 'हमारा' की भावना पैदा करनी होगी। समाज में कोई भी व्यक्ति खुद को पराया महसूस न करे। इसके लिए जमीनी स्तर पर प्रयास करने होंगे। कुछ लोग धोखे और लालच के वशीभूत होकर धर्मांतरण कर लेते हैं। जिन लोगों को अपने धर्म की कम जानकारी होती है या आस्था कमजोर होती है, वे किसी के बहकावे में जल्दी आते हैं। इसका समाधान समाज को ही ढूंढ़ना होगा। अपने बच्चों को धर्म का ज्ञान अवश्य दें। हर पखवाड़े या महीने में एक बार मोहल्ला स्तर पर धर्म के संबंध में सामान्य भाषा में चर्चा करें। ऐसे आयोजन सिर्फ विद्वानों तक सीमित न रहें। उनमें किशोरों और युवाओं को शामिल करें। उन्हें प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करें। नई पीढ़ी का मनोबल बढ़ाएं। उसे जिम्मेदारी दें। बच्चों को डांटने, फटकारने, अयोग्य घोषित करने, पथभ्रष्ट बताने और पुराने ज़माने को सबसे अच्छा साबित करने में ऊर्जा न लगाएं। सोचिए, आज जिन बच्चों को स्नेह का वातावरण नहीं मिल रहा, प्रश्न पूछने पर फटकार मिल रही है, वे भविष्य में किसी अन्य 'विचारधारा' के प्रभाव में आएंगे तो क्या करेंगे?
देश में घुसपैठ की समस्या वर्षों से बनी हुई है। इस पर बातें खूब होती हैं। नेतागण अपनी जनसभाओं में वादे भी करते हैं। इस मामले में आम आदमी सिर्फ इतना कर सकता है कि जिस पर शक हो, उसके बारे में प्रशासन को सूचित कर दे। उसके बाद अधिकारियों को कार्रवाई करनी चाहिए। देश के पास सक्षम खुफिया एजेंसियां और मजबूत सुरक्षा बल हैं। अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो घुसपैठिए यह देश छोड़कर खुद ही भागने लग जाएं। देश में जन्म दर कम हो रही है। पहले, जहां सामान्य दंपति की चार-पांच संतानें होती थीं, अब एक या ज्यादा से ज्यादा दो होती हैं। कई दंपति संतान चाहते ही नहीं, क्योंकि उन्होंने शिक्षा और रोजगार के मामले में इतनी परेशानियां झेली हैं कि अब किसी बच्चे को दुनिया में नहीं लाना चाहते। जब जन्म दर में भारी कमी आ जाती है तो कई गंभीर समस्याएं पैदा होने लगती हैं। जापान और दक्षिण कोरिया इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। वहां सरकारें संतानोत्पत्ति को प्रोत्साहन दे रही हैं, लेकिन नतीजे निराशाजनक ही मिल रहे हैं। भारत में कभी ऐसी नौबत न आए, इसके लिए सरकारों को सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की दशा सुधारनी चाहिए। इन दोनों की हालत किसी से छिपी हुई नहीं है। निजी स्कूलों की पढ़ाई और निजी अस्पतालों की सेवाएं सामान्य परिवारों के बजट से बाहर होती जा रही हैं। अब एक बच्चे को अच्छी पढ़ाई और अच्छी चिकित्सा सुविधा दिलाना मुश्किल हो गया है। ऐसे में दो या तीन बच्चों की जिम्मेदारी कितने दंपति ले सकते हैं? पढ़ाई के बाद बड़ा मुद्दा है- कमाई। देश में आजादी के तुरंत बाद स्वरोजगार को प्रोत्साहन देने वाली शिक्षा पद्धति आनी चाहिए थी। अगर स्कूलों में पढ़ाई के साथ ही कामकाज के बारे में जानकारी दी जाती तो इतनी बेरोजगारी नहीं होती। सिर्फ सरकारी नौकरियां देकर बेरोजगारी दूर नहीं कर सकते। स्वरोजगार को बढ़ावा देने से ही खुशहाली के रास्ते खुलेंगे। शिक्षा पद्धति ऐसी होनी चाहिए कि स्कूली पढ़ाई पूरी करते ही बच्चा अपने रोजगार को लेकर निश्चिंत रहे। अगर ऐसा हो जाए तो जनसंख्या असंतुलन का प्रभावी समाधान मिल जाए।