बेंगलूरु/दक्षिण भारत। अमेज़न इंडिया ने बुधवार को आईआईटी रूड़की के साथ महत्त्वपूर्ण साझेदारी की। इसके अंतर्गत कृषि अवशेषों से ऐसे नए पैकेजिंग मटीरियल तैयार किए जाएंगे, जो लकड़ी आधारित कागज़ और प्लास्टिक पैकेजिंग का विकल्प बनें।
इस योजना का मकसद लकड़ी पर आधारित नहीं, बल्कि कृषि अवशेषों से तैयार होने वाली कागज़ तकनीक को विकसित करना है, ताकि इन अवशेषों को जलाने के बजाय उपयोग किया जा सके और नए लकड़ी वाले पल्प पर निर्भरता कम हो। नई पैकेजिंग हल्की होने के साथ मजबूत और पूरी तरह से पुनर्चक्रण योग्य होगी।
शोध के दौरान गेहूं की पराली और गन्ने की बगास जैसे कृषि अवशेषों से उच्च गुणवत्ता वाला पल्प तैयार किया जाएगा। उसका इस्तेमाल ऐसे कागज़ और पैकेजिंग सामग्री बनाने में होगा, जिनकी मजबूती और टिकाऊपन पारंपरिक पैकेजिंग के समान हो। यह प्रयास न केवल पराली जलाने की समस्या को घटाने में सहायक होगा, बल्कि आयातित लकड़ी के पल्प पर निर्भरता कम करेगा। इससे किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी के मौके भी पैदा होंगे।
आईआईटी रूड़की के पेपर और पैकेजिंग टेक्नोलॉजी विभाग के साथ यह शोध परियोजना प्रारंभ में लगभग 15 महीनों तक लैब स्तर पर परीक्षण और विकास के चरण में रहेगी। परिणाम सकारात्मक रहने पर अमेज़न औद्योगिक परीक्षण, प्रक्रिया की पुष्टि और व्यावसायिक उत्पादन को अगले वर्ष के मध्य या अंत तक आगे बढ़ाने में सहयोग देगा।
अमेज़न इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट (ऑपरेशंस) अभिनव सिंह ने कहा, 'अमेज़न में हम भारत का सबसे तेज़, सुरक्षित और भरोसेमंद ऑपरेशंस नेटवर्क विकसित कर रहे हैं। इसे अधिक टिकाऊ बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। आईआईटी रूड़की के साथ यह साझेदारी हमें कृषि अवशेषों से नवीन पैकेजिंग समाधान तैयार करने का अवसर देती है। भारत में हर साल लगभग 500 मिलियन टन कृषि अपशिष्ट उत्पन्न होता है। यदि इसे पैकेजिंग सामग्री में परिवर्तित किया जाए तो हम सर्कुलर इकोनॉमी को सुदृढ़ कर सकते हैं और पारंपरिक संसाधनों पर निर्भरता कम कर सकते हैं।'
आईआईटी रूड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा, 'आज सस्टेनेबिलिटी कोई विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुकी है। अमेज़न और आईआईटी रूड़की का यह सहयोग सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में भारत के विज़न को आगे बढ़ाने का एक मजबूत कदम है, जो स्वच्छ भारत, स्टार्टअप इंडिया और राष्ट्रीय संसाधन दक्षता नीति जैसे सरकारी अभियानों के अनुरूप है। कृषि अवशेषों को बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग में बदलकर हम पराली जलाने और नए मटीरियल पर निर्भरता जैसी दो बड़ी चुनौतियों को एकसाथ हल कर रहे हैं। यह पहल दिखाती है कि अकादमिक शोध और उद्योग की साझेदारी मिलकर देश के लिए टिकाऊ और आत्मनिर्भर समाधान कैसे तैयार कर सकती है।'