आतंकवाद की आग भड़काने वाला पाकिस्तान अब खुद उससे झुलस रहा है। बलूचिस्तान में दर्जनों अलगाववादियों और सुरक्षा बलों के जवानों की मौत के बाद यह हकीकत खुलकर सामने आ गई है कि पाकिस्तान अंदर से बहुत कमजोर हो गया है। अगर अलगाववाद की यह लहर और मजबूत हुई तो इस पड़ोसी देश का अस्तित्व गंभीर संकट में पड़ सकता है। इसका नक्शा भी बदल सकता है। बलूचिस्तान की घटना उन संगठनों और लोगों के लिए सबक है, जो पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर शांति और सद्भाव को खतरे में डालते हैं। पाक ने अपने किसी प्रांत के साथ इन्साफ नहीं किया। बलूचिस्तान में आजादी की मुहिम चल रही है, सिंध भी धधक रहा है। केपीके में आए दिन धमाके होते रहते हैं। पहले, पंजाब को बहुत सुरक्षित माना जाता था। वहां भी कट्टरपंथ जड़ें जमा चुका है। पाकिस्तान की इस हालत के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार उसकी फौज है। सैन्य अधिकारियों ने लूट मचाकर अपने खजाने भरे और जनता को जरूरत की छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसाते रहे। बलूचिस्तान में गैस और खनिजों के बड़े भंडार हैं। संसाधनों की दृष्टि से इतना संपन्न होने के बावजूद यह प्रांत बदहाल है। इसके गैस भंडार से लाहौर, इस्लामाबाद, कराची जैसे शहरों में लोग खाना बनाते हैं, जबकि आम बलूच लकड़ी का चूल्हा फूंकने को मजबूर है। पाकिस्तानी फौज ने बलूचिस्तान में उद्योग-धंधों को पनपने ही नहीं दिया, लेकिन उसके अधिकारी वहां जमकर मलाई खा रहे हैं। हर महीने हजारों लीटर ईरानी तेल की तस्करी होती है, जिसमें अधिकारियों का हिस्सा होता है।
जब हर तरफ से बलूचों को इतना दबाया जाएगा तो वे अपना हक मांगने के लिए क्यों नहीं खड़े होंगे? उन्होंने हाल के वर्षों में कई घातक हमले किए हैं। ताजा हमला बहुत बड़ी तैयारी का नतीजा है। बलूचों ने क्वेटा, सिबी, ग्वादर, नोशकी, पसनी में पाकिस्तानी फौज को धूल चटा दी। उन्होंने बैंक शाखाओं और महत्त्वपूर्ण इमारतों पर कब्जे कर लिए थे। सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा, लेकिन इसे आखिरी हमला नहीं समझना चाहिए। बलूच फैसला कर चुके हैं कि वे पाकिस्तान के झंडे तले नहीं रहेंगे। वे जुल्म और ज्यादती को बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह स्थिति रातोंरात पैदा नहीं हुई है। पाकिस्तान के हुक्मरान कश्मीर की शांति भंग करने की कोशिशों में दशकों से आतंकवाद को बढ़ावा देते रहे हैं। इस पर अरबों डॉलर खर्च कर दिए। अगर यह राशि अपने नागरिकों की भलाई पर खर्च करते तो हालात ऐसे न होते। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ स्वीकार कर चुके हैं कि उन्हें मित्र देशों से वित्तीय सहायता मांगते हुए अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है। वहां सेना प्रमुख हो या प्रधानमंत्री, दोनों इसी काम में लगे रहते हैं। शहबाज शरीफ के शब्दों- 'जब आप ऋण लेने जाते हैं तो आपको अपने आत्मसम्मान की कीमत चुकानी पड़ती है। आपको समझौता करना पड़ता है ... कभी-कभी अनुचित मांगें सामने आ सकती हैं और आपको उन्हें पूरा करना पड़ सकता है, भले ही उन्हें पूरा करने का कोई कारण न हो।'- से पता चलता है कि पाकिस्तान को आतंकवादी मानसिकता की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। इस चक्रव्यूह से निकलने का सिर्फ एक तरीका है- आतंकवाद का रास्ता छोड़ें, भारत के साथ संबंधों को सुधारें। पाकिस्तान के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो भविष्य में उसके अस्तित्व पर संकट आना तय है।
अपने ही चक्रव्यूह में फंसा पाकिस्तान
पाक ने अपने किसी प्रांत के साथ इन्साफ नहीं किया
बलूचिस्तान में आजादी की मुहिम चल रही है