अपनाएं ये उपाय, डॉलर के सामने शेर की तरह दहाड़ेगा हमारा रुपया

सबसे पहला और सरल कदम है- स्वदेशी को प्राथमिकता देना

मजबूत रुपया केवल एक मुद्रा नहीं, बल्कि एक मजबूत देश का प्रतीक है

.. दितिका कानूनगो ..

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। पिछले कुछ समय से हम समाचारों में बार-बार सुन रहे हैं कि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है। यह खबर अक्सर अर्थशास्त्र तक सीमित समझ ली जाती है कि इसका असर सिर्फ़ सरकार, बाज़ार या बड़े उद्योगों पर ही पड़ता हो। सच्चाई यह है कि रुपए की मज़बूती या कमजोरी हमारे रोज़मर्रा के जीवन के साथ गहराई से जुड़ी हुई है।

जब रुपया गिरता है तो सबसे पहले हमारी जेब पर असर दिखता है। पेट्रोल-डीज़ल महंगे होते हैं, आयातित सामान की कीमत बढ़ती है। मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, दवाइयां और यहां तक कि खाने-पीने की कई चीज़ें भी महंगी हो जाती हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एक आम भारतीय के रूप में हम कुछ कर सकते हैं या यह सब सिर्फ़ नीतियों और वैश्विक बाज़ार का खेल है?

रुपया सिर्फ़ सरकार से नहीं, हम सब से बनता है

सबसे पहला और सरल कदम है- स्वदेशी को प्राथमिकता देना। जब हम विदेशी सामान के बजाय देश में बने उत्पाद खरीदते हैं तो आयात पर निर्भरता कम करते हैं। छोटी-सी बात लग सकती है, लेकिन अगर लाखों लोग मिलकर ऐसा करें तो इसका असर बड़ा होता है। स्थानीय दुकानदार से खरीदारी करना, भारतीय ब्रांड्स को अपनाना और अनावश्यक विदेशी दिखावे से बचना, ये सभी कदम रुपए को मज़बूती देने में मदद कर सकते हैं।

दूसरा अहम पहलू है- ईंधन की समझदारी से खपत। भारत तेल और गैस का बड़ा हिस्सा बाहर से मंगाता है। जब हम बिजली, पेट्रोल और गैस का ज़रूरत से ज़्यादा उपयोग करते हैं तो अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ाते हैं। घर में बिजली बचाना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना, कार पूलिंग जैसी आदतें न सिर्फ़ पर्यावरण के लिए अच्छी हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी।

तीसरा उपाय- देश के भीतर पर्यटन को बढ़ावा देना भी एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। जब हम छुट्टियां विदेश में बिताते हैं तो विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। वहीं, देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा करने से पैसा देश के भीतर ही घूमता है, स्थानीय रोज़गार बढ़ता है और अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है।

इसके अलावा, कौशल और उत्पादन भी रुपए की ताक़त का आधार हैं। आज का युवा अगर बेहतर कौशल सीखता है, नवाचार करता है और दुनिया को भारतीय सेवाएं व उत्पाद देता है तो विदेशी मुद्रा देश में आती है। यह काम केवल बड़ी कंपनियों का नहीं, बल्कि स्टार्टअप्स, फ्रीलांसर्स और छोटे व्यवसायों का भी है।

एक और ज़रूरी बात है- अफवाहों और घबराहट से बचना। जब भी रुपए में गिरावट की खबर आती है तो कई लोग डर के कारण गलत आर्थिक फैसले ले लेते हैं। समझदारी, धैर्य और सही जानकारी के साथ लिया गया फैसला हमेशा बेहतर होता है।

कुछ और छोटे लेकिन असरदार कदम यह हैं, जिन पर हम अक्सर ध्यान नहीं देते -

- विदेशी ब्रांड्स की जगह रोज़मर्रा की चीज़ों में भारतीय विकल्प चुनना, चाहे वह साबुन हो या स्नैक्स।

- अनावश्यक खर्च घटाकर बचत और निवेश की आदत डालना, जिससे देश के भीतर पूंजी मज़बूत होती है।

- टैक्स समय पर भरना और ऊर्जा की बचत करना, ताकि आयात पर निर्भरता घटे और आर्थिक संतुलन बना रहे।

यह सच है कि रुपए की कीमत कई वैश्विक कारणों से तय होती है, जैसे- अंतरराष्ट्रीय राजनीति, युद्ध, वैश्विक मंदी या ब्याज दरें, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि देश की आर्थिक रीढ़ उसके नागरिकों के व्यवहार से मज़बूत होती है।

अगर हम अपने छोटे-छोटे फैसलों में देशहित को जगह दें तो रुपया सिर्फ़ आंकड़ों में नहीं, आत्मविश्वास में भी मज़बूत होगा। आखिरकार, मजबूत रुपया केवल एक मुद्रा नहीं, बल्कि एक मजबूत देश का प्रतीक है।

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