अतीत में उलझे रहेंगे तो आगे कब बढ़ेंगे?

'एक हैं तो सेफ हैं' जैसे नारे एक हफ्ते में भुला दिए गए

सामाजिक न्याय का यह मतलब नहीं कि दूसरों से छीन लिया जाए ...

यूजीसी नियमों को लेकर जारी विवाद के बीच जातिगत भेदभाव और आरक्षण के मुद्दे पर भी बहस हो रही है। एक वर्ग के विद्यार्थियों का तर्क है कि हमारे पूर्वजों का सदियों तक शोषण किया गया, इसलिए अब हमें कुछ विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिएं। वहीं, एक और वर्ग के विद्यार्थियों का यह तर्क भी वजन रखता है कि देश में सदियों तक विदेशी आक्रांताओं का शासन था, हमारे पूर्वज पराधीन थे। वे शोषक कैसे हो सकते हैं? हिंदू एकता के लिए 'एक हैं तो सेफ हैं' जैसे नारे एक हफ्ते में भुला दिए गए। हम हिंदुस्तानी कितनी आसानी से बंट जाते हैं! विदेशी शासक झूठ का ऐसा मकड़जाल बिछाकर चले गए कि आज भारतवासी अपनी दशा के लिए अपने ही किसी भाई को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ में लोग यह दोषारोपण करते मिल जाएंगे कि फलां वर्ग ने हमें दबाया, पढ़ने नहीं दिया, हमारे संसाधनों का उपयोग किया, लेकिन यह सच्चाई लिखने का साहस कितने लोग दिखाते हैं कि विदेशी शासकों ने हम सबको दबाया, गलत इतिहास पढ़ाया, हमारे संसाधनों को लूटा? आजादी के बाद नेताओं की एक ऐसी मंडली खड़ी हो गई, जो जनता को सही मायनों में शिक्षित करने के बजाय गड़े मुर्दे ही उखाड़ती रही। गरीबी कैसे दूर होगी? बेरोजगारी का उन्मूलन कैसे होगा? स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे सुलभ होंगी? उनके पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है। वे सिर्फ पुराने घावों को हरा करना जानते हैं। वे एक वर्ग के बच्चों को उन कथित अपराधों के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं, जो उन्होंने कभी किए ही नहीं।

अत्याचार तो अंग्रेजों ने किए थे। क्या उनके कुकृत्यों के लिए ब्रिटेन की वर्तमान पीढ़ी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? क्या बाबर के अत्याचारों के लिए उज़्बेकिस्तान के लोगों से जवाब मांगना चाहिए? मुहम्मद ग़ौरी ने जो रक्तपात किया था, उसका हिसाब अफगानिस्तान के लोगों से लेना चाहिए? अगर हम अतीत में ही उलझे रहेंगे तो आगे कब बढ़ेंगे? यह भी याद रखें कि हर सदी में सामाजिक नियम बदलते हैं, नैतिकता बदलती है। सौ साल पहले कोई व्यक्ति किसी 10 वर्षीय निर्धन बालक की मदद करने के लिए उसे नौकरी पर रखता तो वह महान दयालु कहलाता। अगर आज कोई व्यक्ति ऐसा करे तो वह बालश्रम करवाने का गुनहगार कहलाएगा। वह ज़माना और था, यह ज़माना और है, आने वाला ज़माना कुछ और होगा। जब अतीत का हिसाब करते हैं तो यह न भूलें कि अगली सदी में हम सब पर कुछ ऐसे आरोप लग सकते हैं- '21वीं सदी के लोग अत्याचारी थे, क्योंकि पालतू जानवरों को रस्सी से बांधकर रखते थे, उन्हें कपड़े नहीं पहनाते थे ... खुद तो बहुत सांस लेते थे, लेकिन ऑक्सीजन के लिए पौधे नहीं लगाते थे ... एसी कक्ष में बैठकर पर्यावरण संरक्षण की बातें करते थे।' इन दिनों सामाजिक न्याय की बातें बहुत हो रही हैं। इसकी स्थापना के लिए कुछ लोग एक अजीब तरीके का समर्थन कर रहे हैं- 'जिसके पास ज्यादा है या पहले ज्यादा रहा है, उससे छीनें और उसे दें, जिसके पास कम है या पहले नहीं था।' इससे देश का कितना भला होगा, यह एक प्रसिद्ध उदाहरण से समझ सकते हैं- 'किसी गांव में सभी लोग गरीब थे। उनमें से एक प्रतिभा संपन्न युवक पढ़-लिखकर शहर में कमाई करने लगा। एक बार जब वह गांव आया तो किसी ने क्रांतिकारी फॉर्मूले के तहत उससे सारे रुपए छीन लिए और सबको बांट दिए। इससे लोगों की हालत कुछ सुधर गई। युवक के साथ तीन बार ऐसा ही हुआ। वह कमाकर लाता और उससे रुपए छीन लिए जाते। आखिर में उसने कमाना ही बंद कर दिया। वह गरीब हो गया। गांव के सभी लोग वापस गरीब हो गए।' सामाजिक न्याय का यह मतलब नहीं कि दूसरों से छीन लिया जाए, बल्कि यह है कि सबको अच्छे माहौल में अपनी उन्नति करने के लिए समान अवसर दिए जाएं और किसी से भेदभाव न किया जाए।

About The Author: News Desk