.. दितिका कानूनगो ..
बेंगलूरु/दक्षिण भारत। इंदौर से आई एक खबर ने हाल के दिनों में प्रशासन और समाज - दोनों को सोचने को मजबूर किया। एक व्यक्ति, जिसे भिखारी समझा गया, के लाखों की संपत्ति का मालिक होने की बात सामने आई है। बाद में परिजन ने इसे गलतफहमी बताया और संबंधित व्यक्ति ने खुद को भिखारी मानने से इन्कार किया।
हकीकत जो भी हो, लेकिन इस घटना ने एक अहम सवाल ज़रूर खड़ा कर दिया- क्या आज भारत में भीख वाकई आख़िरी मजबूरी है या फिर यह एक ऐसा रास्ता बन चुका है, जिसे कई लोग जानबूझकर चुन रहे हैं?
देश के बड़े शहरों में ऐसे उदाहरण नए नहीं हैं। बेंगलूरु, मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में समय-समय पर यह सामने आता रहा है कि कई चर्चित भिखारी आर्थिक रूप से मजबूत हैं। किसी के पास मोटा बैंक बैलेंस है, तो किसी के नाम ज़मीन-जायदाद।
ये तथ्य उस धारणा को तोड़ते हैं कि भीख केवल भूख या लाचारी का नतीजा है। कुछ लोगों के लिए यह बिना निवेश, बिना टैक्स और बिना किसी जवाबदेही के नियमित आय का साधन बन चुकी है- ऐसा ‘काम’ जिसमें न समय तय है, न मेहनत की शर्त।
बदल रहा भीख मांगने का अंदाज़
यह भी संयोग नहीं है कि भिखारी अक्सर उन्हीं जगहों पर दिखाई देते हैं, जहां इन्सान सबसे ज़्यादा भावुक होता है- मंदिरों और धार्मिक स्थलों के बाहर, पर्यटन केंद्रों पर, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और बड़े अस्पतालों के आसपास। यहां दया जल्दी जागती है और सवाल पीछे छूट जाते हैं।
आस्था, अपराधबोध और इन्सानियत के बीच हम अक्सर यह नहीं पूछते कि सामने वाला सचमुच असहाय है या नहीं! यही भावनात्मक कमजोरी इस पूरे तंत्र की सबसे मजबूत कड़ी बन चुकी है। भीख मांगने का अंदाज़ भी अब पहले जैसा नहीं रहा। आज यह काम झिझक या संकोच के साथ नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ किया जा रहा है।
कई बार तो यह आत्मविश्वास दबाव में बदल जाता है। कुछ भिखारी तब तक पीछा नहीं छोड़ते, जब तक सामने वाला पैसे न दे दे। यह दृश्य अब असामान्य नहीं रहा। सवाल यह नहीं कि इन्हें लज्जा नहीं आती। सवाल यह है कि क्या समाज ने ही इस व्यवहार को सामान्य मान लिया है?
तीर्थों और घूमने-फिरने की जगहों पर भिखारियों के झुंड विदेशी पर्यटकों के लिए भी भारत की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। संस्कृति, अध्यात्म और विविधता के साथ-साथ उन्हें एक ऐसा देश भी दिखता है, जहां गरीबी और अव्यवस्था सड़कों पर खुलकर दिखाई देती हैं। चाहे वह वास्तविक हो या बनाई गई। यह छवि केवल पर्यटन की नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनशीलता की भी कहानी कहती है।
नीति और पुनर्वास भी जरूरी
इसी पृष्ठभूमि में इंदौर प्रशासन का वह फैसला चर्चा में आया, जिसमें भीख देने पर एफआईआर दर्ज करने का प्रावधान किया गया। यह कदम सख्त है, लेकिन यह भी बताता है कि समस्या को अब केवल भावनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हालांकि, केवल दंड से इस प्रवृत्ति को रोका जा सकेगा, यह मान लेना भी सरल समाधान होगा। जब भीख एक संगठित गतिविधि का रूप ले चुकी हो, तो उसका जवाब सिर्फ कानून नहीं, बल्कि नीति और पुनर्वास भी होना चाहिए।
इस पूरी बहस में एक अहम पहलू अक्सर छूट जाता है- हम खुद। जब तक समाज बिना सोचे-समझे भीख देता रहेगा, तब तक यह चक्र चलता रहेगा। कई बार यह दया नहीं, बल्कि तात्कालिक आत्म-संतोष होता है- एक सिक्का देकर आगे बढ़ जाने की सुविधा। अनजाने में यही आदत उस व्यवस्था को मजबूत करती है, जिसमें वास्तविक जरूरतमंद पीछे छूट जाते हैं और पेशेवर भिखारी आगे बढ़ते हैं।
काम और कौशल से जोड़ें
भीख को रोकने का रास्ता केवल रोक-टोक से नहीं निकलेगा। जो लोग शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम हैं, उन्हें काम और कौशल से जोड़ना होगा। बच्चों, बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के नाम पर होने वाले शोषण पर सख्त निगरानी जरूरी है। दान को ऐसे संगठित और साफ़ तरीकों से जोड़ना होगा, जिससे मदद सच में ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचे, न कि किसी धंधे का हिस्सा बन जाए।
इंदौर की घटना चाहे गलतफहमी हो या प्रशासनिक चूक, उसने समाज के सामने एक आईना रख दिया है। सवाल यह नहीं है कि सड़क पर बैठा व्यक्ति भिखारी है या नहीं। असल सवाल यह है कि क्या हम अब भी यह मानते रहेंगे कि भीख ही आख़िरी रास्ता है, या यह स्वीकार करेंगे कि कई मामलों में यह एक व्यवस्थित कारोबार बन चुकी है, जिसे हमने अपनी चुप्पी और 'दया' से बड़ा होने दिया है?
अब ज़रूरत है रुककर देखने की, आसपास झांकने की और खुद से सवाल करने की, क्योंकि अगर हम नहीं बदले तो सड़कों पर भीख नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चुप्पी और संवेदनहीनता ज़्यादा साफ दिखाई देगी।