एक मशहूर संगीतकार ने हिंदी फिल्म उद्योग में कम काम मिलने को जिस तरह सांप्रदायिकता से जोड़ने की कोशिश की है, वह हकीकत से कोसों दूर है। जिस देश की जनता ने उनके काम को खूब सराहा, सम्मान किया, उन्होंने इन सब पर एक झटके में पानी फेर दिया! हर साल हिंदी फिल्म उद्योग में बहुत लोग आते हैं। उनमें से कुछ ही लोग जल्दी सफलता पाते हैं। ज्यादातर को लंबे संघर्ष के बाद कुछ सफलता मिलती है। यह टिकी रहेगी, इस बात की कोई गारंटी नहीं होती। ऐसे दर्जनों उदाहरण दिए जा सकते हैं, जब किसी का नाम चमका तो खूब चमका, लेकिन कुछ साल बाद वह अर्श से फर्श पर आ गया। उनमें से बहुत लोग भारत के बहुसंख्यक समुदाय से मिलेंगे। वे इसके लिए किसके माथे पर दोष मढ़ें? इसी हिंदी फिल्म उद्योग ने ऐसे लोगों को भी सुपर स्टार बनाया, जिन्होंने बड़े पर्दे पर बहुसंख्यक वर्ग की आस्था का मजाक उड़ाया था। इसके बावजूद उन्हें देश में असहिष्णुता नजर आती है! इससे ज्यादा सहिष्णुता और कहां मिलेगी? क्या कोई व्यक्ति ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, पाकिस्तान या अफगानिस्तान में रहकर ऐसी फिल्मों में नजर आ सकता है? अगर कोई इतनी हिम्मत दिखा ही दे तो क्या वह उस देश में दोबारा नजर आ सकता है? भारत में यह ट्रेंड बन चुका है कि जब तक फिल्मों में काम मिल रहा है, बढ़िया पैसा आ रहा है तो सबकुछ अच्छा है। जैसे ही कुछ उतार-चढ़ाव आने लग जाएं, समाज को कोसना शुरू कर दें!
कुछ बुद्धिजीवी उनके पक्ष में हमेशा खड़े मिलते हैं। वे कला के नाम पर अनर्गल चीजें पेश करने के लिए एकतरफा आजादी चाहते हैं। उनकी मंशा रहती है कि सबकुछ उसी पुराने ढर्रे पर चलना चाहिए। अगर कोई निर्माता कश्मीरी पंडितों के उत्पीड़न को दर्शाने वाली फिल्म बना दे तो उन्हें उसमें झूठ नजर आने लगता है। वे कहते हैं कि ऐसा कभी हुआ ही नहीं था! अगर कोई निर्माता अपनी फिल्म में पाकिस्तान और उसके आतंकवादी संगठनों का कच्चा चिट्ठा खोल दे तो वे कहते हैं कि यह पड़ोसी देश के लिए नफरत भड़काने की कोशिश है, गोया वहां से बम नहीं, गुलाब के फूल आ रहे हों! ऐसा कब तक चलता रहेगा? अब सोशल मीडिया का जमाना है। लोग अपनी पसंद-नापसंद को खुलकर जाहिर कर सकते हैं। लेखकों, निर्माताओं, निर्देशकों, अभिनेताओं, संगीतकारों को इसका ध्यान रखना चाहिए। अगर फिल्म उद्योग को अन्य उद्योगों की तरह देखें तो याद रखें, हर दशक में लोगों की पसंद बदल जाती है। जैसे संवाद पचास के दशक में लिखे जाते थे, वैसे आज नहीं लिखे जा सकते, क्योंकि भाषा के स्तर पर बहुत बदलाव आ चुके हैं। कहानियां बदल चुकी हैं। संगीत बहुत बदल चुका है। फिल्म निर्माण की तकनीक बदल चुकी है। क्या आज कोई निर्माता सत्तर के दशक की मशीनें लेकर उस दौर की पटकथा से फिल्म बना सकता है? पुरानी चीजों के साथ सुनहरी यादें जरूर जुड़ी होती हैं, लेकिन समय के साथ बदलाव आता ही है। इसके लिए फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों को तैयार रहना चाहिए। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पुरानी सफलता हमेशा साथ नहीं देती। उससे सम्मान जरूर मिलता है, लेकिन प्रासंगिक बने रहने के लिए यह काफी नहीं है। दर्शकों के साथ जुड़ाव और निर्माताओं, निर्देशकों के साथ संबंध बहुत मायने रखते हैं। किसी को कोसने से बेहतर है कि नए दौर के साथ खुद को तैयार करें।