केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 'डिजिटल अरेस्ट' से जुड़े मामलों की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित कर साइबर अपराध के इस तरीके के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार और बैंकों द्वारा कई बार नागरिकों को सूचित किया जा चुका है कि डिजिटल अरेस्ट एक झूठ है। अगर कोई व्यक्ति या संगठन इसके नाम पर धमकाने की कोशिश करे तो उसकी बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। इसके बावजूद लोग ठगी के शिकार हो रहे हैं। हाल में दिल्ली में एक बुजुर्ग दंपति को डिजिटल अरेस्ट कर 15 करोड़ रुपए की ठगी की गई। यह नए साल में साइबर अपराधियों द्वारा ठगी गई सबसे बड़ी रकम है। दोनों पीड़ित डॉक्टर हैं, वर्षों अमेरिका में रहे हैं, यूएन में नौकरी कर चुके हैं। साइबर अपराधियों ने उनकी ज़िंदगीभर की बचत ठग ली। इतने उच्च शिक्षित और जीवन का लंबा अनुभव रखने वाले लोग इतनी आसानी से साइबर ठगों के जाल में कैसे फंस गए? अखबारों, टीवी चैनलों, सोशल मीडिया पर ऐसे मुद्दे बहुत चर्चा में हैं। अगर उन्होंने खबरें पढ़ने के लिए थोड़ा समय निकाला होता तो इस नुकसान से बच जाते। साल 2023 से अब तक डिजिटल अरेस्ट के मामलों की बाढ़-सी आ गई है। साइबर अपराधी नकली पुलिस अधिकारी और जज बनकर मोबाइल फोन पर प्रकट होते हैं। उसके बाद धमकाने का सिलसिला शुरू होता है। हमारे देश में आम लोग पुलिस थानों और अदालतों से डरते हैं। इस डर का फायदा साइबर ठग उठा रहे हैं। थानों और अदालतों को देखकर लोगों के मन में सुरक्षा की भावना पैदा होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। यह कहीं-न-कहीं व्यवस्था की कमी को दर्शाता है।
कई उच्च शिक्षित और जीवन का लंबा अनुभव रखने वाले लोगों को लगता है कि उन्हें सबकुछ पता है। वे अति-आत्मविश्वास के कारण साइबर ठगों के जाल में फंस जाते हैं। पिछले दिनों पंजाब के एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी, जो अपने जमाने में बहुत तेज-तर्रार माने जाते थे, को साइबर ठगों ने 8 करोड़ का चूना लगा दिया। मुंबई के एक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी ने 1.35 करोड़ रुपए गंवा दिए। ये दोनों मामले फर्जी निवेश योजनाओं के थे। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में एक सेवानिवृत्त सैनिक से साइबर अपराधियों ने 98 लाख रुपए ठग लिए। उन्हें 15 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखा गया। चंडीगढ़ में एक बुजुर्ग को डिजिटल अरेस्ट कर 52 लाख रुपए ठग लिए। पीड़ितों को पुलिस, सीबीआई, ईडी और विभिन्न जांच एजेंसियों का डर दिखाकर जेल में डालने की धमकी दी गई थी। सबको मालूम होना चाहिए कि हमारे देश में डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। सोचिए, अगर किसी ने इतना गंभीर अपराध किया है कि पुलिस, सीबीआई, ईडी और कई एजेंसियों को उसकी तलाश है, तो क्या उसे सिर्फ डिजिटल अरेस्ट किया जाएगा? ऐसे खतरनाक अपराधी की भनक लगते ही एजेंसियां घर में घुसकर उसे गिरफ्तार करती हैं। एक और चौंकाने वाली बात यह है कि कई साइबर ठगों के पास लोगों का डेटा होता है। वे उसके आधार पर ठगी की साजिश रचते हैं। उन्हें पता है कि बीस-पच्चीस साल के युवाओं के पास ज्यादा रुपए नहीं होते, इसलिए ऐसे आयु वर्ग को निशाना बनाते हैं, जिसके पास अच्छी-खासी बचत होती है। सेवानिवृत्त लोग या तो डिजिटल अरेस्ट के नाम पर अपनी कमाई गंवा देते हैं या वे निवेश योजना के नाम पर झांसे में आते हैं। साइबर ठग हर साल कोई नया तरीका ढूंढ़ते हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति को यह बिंदु जरूर ध्यान में रखना चाहिए। जब 'डिजिटल अरेस्ट' पुराना हो जाएगा तो साइबर ठग कोई नया शिगूफा छोड़ेंगे। उनकी चाल को तकनीकी उपायों के जरिए पहले ही नाकाम कर देना चाहिए।