उच्चतम न्यायालय ने सरकारों द्वारा आवारा जानवरों से संबंधित नियमों के क्रियान्वयन को लेकर पर्याप्त कदम नहीं उठाए जाने पर चिंता जताते हुए आम आदमी की परेशानियों की ओर ध्यान दिया है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर गंभीरता से चर्चा करने की जरूरत है। देश में इन्सान और जानवर, दोनों के जीवन की रक्षा होनी चाहिए। जब कभी कोई आवारा जानवर राह चलते लोगों को टक्कर मार देता है या कोई श्वान (डॉग) किसी को काट लेता है तो यह कहकर मामले से पल्ला झाड़ लिया जाता है कि 'ये तो जानवर हैं, इनमें समझ नहीं है'! हर साल इन घटनाओं में लाखों लोग घायल होते हैं। कुछ तो जान गंवा देते हैं। अब समय आ गया है कि सरकारें ऐसे ठोस कदम उठाएं, जो इन्सान और जानवर, दोनों के जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करें। यह कितनी बड़ी समस्या है, इसका अंदाजा उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी से लगाया जा सकता है, 'श्वानों के काटने से बच्चों या बुजुर्गों की मौत या चोट के हर मामले के लिए हम राज्य सरकारों से भारी मुआवजा देने की मांग करेंगे, क्योंकि उन्होंने पिछले पांच वर्षों में नियमों के कार्यान्वयन के संबंध में कुछ नहीं किया है।' जानवरों के साथ प्रेम जताना, उनके लिए भोजन-पानी का प्रबंध करना सराहनीय है। कई लोग और संगठन वर्षों से ऐसा कर रहे हैं। उन्हें इस बात की ओर भी ध्यान देना चाहिए कि जानवर अपने सुरक्षित क्षेत्रों में रहें। उनका जीवन खतरे में न पड़े। साथ ही, उनकी वजह से इन्सानों का जीवन भी खतरे में न पड़े।
दिल्ली में एक 20 वर्षीय बाइक सवार का आवारा श्वानों ने पीछा किया। इससे वह बुरी तरह घबराया और गिर पड़ा। अस्पताल में उसकी मौत हो गई। श्वानों का कुछ नहीं बिगड़ा। अब वे किसी अन्य बाइक सवार के पीछे दौड़ेंगे। तेलंगाना के एक गांव में तीन साल का बच्चा अपने घर के पास खेल रहा था। अचानक आवारा श्वानों के एक झुंड ने उस पर हमला कर दिया। बच्चे की मौत हो गई। आवारा श्वान फिर किसी पर धावा बोलेंगे। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में अपने घर के आंगन में खेल रहे एक बच्चे को आवारा श्वान ने जबड़े में दबोच लिया। बच्चा सौभाग्यशाली था कि उसकी दादी वहीं मौजूद थीं। वे अपने पोते को श्वान के जबड़ों से खींच लाईं। बच्चे की जान तो बच गई, लेकिन वह लहूलुहान हो गया। ये सभी घटनाएं जनवरी की हैं। अभी पूरा साल बाकी है। स्वच्छता के लिए चर्चा में रहने वाले एक शहर के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। वहां साल 2025 में आवारा जानवरों द्वारा काटे जाने की वजह से लगभग 55,000 लोग घायल हुए थे। इनमें श्वानों के हमले से घायलों का आंकड़ा 48,000 से ज्यादा रहा। कई जगह तो आवारा श्वानों का भारी खौफ है। वहां से लोगों का निकलना मुश्किल हो जाता है। वे सुबह स्कूली बच्चों और बाइक सवारों को देखते ही उनकी ओर सरपट दौड़ लगाते हैं। अगर लोग बचने के लिए दौड़ें तो श्वान और तेज दौड़ते हैं। अगर लोग न दौड़ें तो श्वान धावा बोल सकते हैं। कार सवारों के लिए थोड़ी राहत रहती है। वे श्वानों के हमलों से काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं, लेकिन कोई श्वान उनके पीछे दौड़ते हुए चोटिल हो जाए तो अन्य लोग इस मामले को क्रूरता से जोड़कर देखते हैं। पिछले साल पंजाब में एक स्कूल बस चालक को स्थानीय लोगों ने बुरी तरह पीट दिया था, क्योंकि बस के पिछले टायर की चपेट में आने से एक श्वान की मौत हो गई थी। ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए सरकारों को जल्द कदम उठाने चाहिएं। जानवर इधर-उधर न भटकें। उन्हें निर्धारित स्थानों पर ही रखा जाए। जो लोग उन्हें भोजन-पानी देना चाहें, वे उधर जाकर दें। इन्सानों के साथ उनका टकराव टालें।