जरदारी ने खोल दी पाकिस्तान की पोल

आतंकवादियों के सुर में सुर मिला रहे जरदारी

जिन्ना से लेकर मुनीर तक, सब एक ही स्क्रिप्ट बांचते रहे हैं

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने डींगें हांकने की कोशिश में अपने मुल्क की पोल खोल दी है। भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर शुरू किए जाने के बाद जरदारी को अपने सैन्य सचिव से बंकर में छिपने की सलाह मिली थी। इसे पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया है। उन्होंने सोचा होगा कि यह सुनकर जनता तारीफों के पुल बांधेगी कि 'हमारे राष्ट्रपति इतने बहादुर हैं कि उन्होंने बंकर में जाने से इन्कार कर दिया था', लेकिन उनका दांव उल्टा पड़ गया। जरदारी ने आखिरकार यह बता दिया कि अगर पाकिस्तान का दुस्साहस बढ़ता तो भारतीय मिसाइलें उनके आवास तक पहुंच सकती थीं। जरदारी खुद को सौभाग्यशाली समझें कि यह बयान देने के लिए मौजूद हैं। अगर लपेटे में आते तो उसी दिन परलोकवासी हो जाते। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आतंकवादियों के साथ उनके खानदान के कई लोग लपेटे में आए थे। उनके शवों को पाकिस्तानी मीडिया आम लोगों के साथ हुआ कथित जुल्म बताता रहा, लेकिन इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं था कि ये लोग आतंकवादियों के ठिकानों में क्या कर रहे थे! वहां कोई समाज सेवा का प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा था। आतंकवादियों के आका उनके दिलो-दिमाग में मानवता के खिलाफ जहर ही भर रहे थे। आसिफ अली जरदारी भी उनसे कम नहीं हैं, क्योंकि ये उनके गुनाहों को छिपाते हैं। इन्हें तो आतंकवाद का खुलकर विरोध करना चाहिए। इनकी पत्नी बेनजीर भुट्टो की आतंकवादियों ने हत्या की थी। जरदारी की नैतिकता देखिए, ये बेनजीर की 18वीं पुण्यतिथि के अवसर पर सिंध प्रांत के लरकाना में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आतंकवादियों के सुर में सुर मिला रहे थे।

आसिफ अली जरदारी के बयान से पहले पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी और नेता यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि वे ऑपरेशन सिंदूर से बिल्कुल भयभीत नहीं थे, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत थी। इनके सेना प्रमुख तो हफ्तों नजर नहीं आए थे। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। पाकिस्तानी मीडिया, खासकर उर्दू अखबार ऐसी खबरें छाप रहे थे, जिनका सच्चाई से कोई संबंध नहीं था। जरदारी ने चुप्पी साध रखी थी। अब खतरा टल गया तो ये बारी-बारी से सामने आकर अपनी कथित वीरता का बखान कर रहे हैं। जरदारी के ये शब्द कि 'अगर शहादत आनी है तो यहीं आएगी ... नेता बंकरों में नहीं मरते ... वे युद्धभूमि में मरते हैं ... वे बंकरों में बैठकर नहीं मरते', अतिशयोक्तिपूर्ण हैं। अगर उनमें शहादत और कुर्बानी का इतना जज्बा है तो सात मई से लेकर एक हफ्ते तक किसी सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करके दिखाते। तब वे कहां थे? जरदारी को वर्ष 1971 के युद्ध का इतिहास पढ़ना चाहिए। तब 14 दिसंबर को भारतीय वायुसेना के विमानों ने ढाका में गवर्नर हाउस पर बमबारी की थी। उसका नतीजा क्या निकला था? तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर एएम मलिक एक उच्च-स्तरीय बैठक छोड़कर भाग गए थे। उन्होंने उसी समय एक पेन निकाला और अपने कांपते हाथों से इस्तीफा दे दिया था। अगर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जरदारी के आवास के पास भारत का ड्रोन भी मंडराता दिख जाता तो ये जनाब कोई जोखिम नहीं लेते, सीधे दुबई या लंदन जाकर रुकते। पाकिस्तानी नेताओं और सैन्य अधिकारियों में डींगें हांकने की आदत बहुत पुरानी है। जिन्ना से लेकर याह्या खान, ज़िया-उल हक, परवेज मुशर्रफ, इमरान खान और आसिम मुनीर तक, सब एक ही स्क्रिप्ट बांचते रहे हैं। जरदारी इसलिए ज्यादा डींगें हांक रहे हैं, क्योंकि ये इस पड़ोसी देश के नेताओं में सबसे ज्यादा अनुभवी हैं!

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