उत्तराखंड में 'कालनेमियों' के दुर्दिन

उत्तराखंड की तरह अन्य राज्य भी हिम्मत दिखाएं

धामी सरकार तारीफ की हकदार है

भारत की भोली-भाली जनता को ठगने के लिए किस स्तर पर साजिश हो रही है, इसका अंदाजा उत्तराखंड सरकार द्वारा चलाए जा रहे 'ऑपरेशन कालनेमि' के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। इसके तहत अब तक तीन जिलों में ही 511 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें 19 बांग्लादेशी भी हैं। यह स्थिति हमारे एक राज्य के तीन जिलों की है! सोचिए, पूरे भारत में ऐसे कितने कालनेमि घूम रहे होंगे? इन पाखंडियों के खिलाफ सख्ती दिखाने के लिए उत्तराखंड सरकार तारीफ की हकदार है। इस अभियान का विस्तार करना चाहिए। अगर हर राज्य में 'ऑपरेशन कालनेमि' चलाया जाए तो बहुत बड़ी तादाद में ठग और पाखंडी पकड़े जा सकते हैं। ये लोग आस्था के नाम पर जनता को लूट रहे हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों का दुस्साहस देखिए, ये भी बहते दरिया में हाथ धो रहे हैं, बल्कि डुबकी लगा रहे हैं। इनके अपने मुल्क में खाने के लाले पड़े हैं और ये इधर साधु-संतों का वेश धारण कर खातिरदारी के मजे लूट रहे हैं। इनकी तो लॉटरी निकल आई है। न कोई काम, न कोई मेहनत ... बस, दो-चार रटे-रटाए शब्द बोलकर अपना उल्लू सीधा करना है। ये अब तक उत्तराखंड में मौज कर रहे थे। अगर बांग्लादेश में होते तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जाता। खैर, उत्तराखंड सरकार की कार्रवाई के बाद इस राज्य के अन्य शहरों में रहने वाले बांग्लादेशी कालनेमियों की नींदें उड़ गई होंगी। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि ये सिर पर मंडराती मुसीबत देख अन्य राज्यों की राह पकड़ लें! वहां भी इनका ऐसा स्वागत होना चाहिए कि तबीयत हरी हो जाए।

वास्तव में 'ऑपरेशन कालनेमि' देवभूमि की गरिमा की रक्षा के लिए चलाया जा रहा है। ठग या पाखंडी किसी भी समुदाय से क्यों न हो, वह अपनी गतिविधियों के कारण सर्वसमाज के लिए खतरा बन सकता है। ऐसे लोग चोरी, डकैती, अपहरण, जासूसी, हत्या, तस्करी और अनैतिक कर्मों में लिप्त हों तो पता लगाना बहुत मुश्किल होता है। इनका कोई निश्चित ठिकाना नहीं होता। कई नागरिकों ने पूर्व में सोशल मीडिया पर दावे किए हैं कि उन्होंने दिन में ऐसे लोगों को घर-घर जाकर मांगते देखा, जनता इन्हें साधु-संत समझकर भोजन, कपड़े, रुपए आदि दे देती है; वहीं, शाम को ये लोग मदिरापान और अन्य अनैतिक कर्म करते हैं। ये जनता के बीच जाकर अंधविश्वास फैलाते हैं। कई तो रौब जमाने की कोशिश करते हैं। हालांकि जब कोई शिक्षित व्यक्ति इनसे सनातन धर्म के बारे में एक-दो प्रश्न पूछ लेता है तो ये बगलें झांकने लगते हैं। इन्हें सामान्य जानकारी भी नहीं होती। अगर कोई व्यक्ति इनका वीडियो बनाता है तो ये आपत्ति जताते हैं। अगर  ये संख्या में ज्यादा हों तो झगड़ा करने लगते हैं। एक वीडियो में देखा गया कि किसी व्यक्ति ने हनुमान चालीसा सुनाने के लिए कहा तो वह शख्स चार पंक्तियां भी नहीं सुना सका। एक और शख्स गांव-गांव घूमकर 'मंदिर निर्माण' के लिए चंदा ले रहा था। जब उससे वेदों और अवतारों के नाम पूछे गए तो वह कुछ नहीं बता सका। उससे पूछा गया कि ढोंग क्यों कर रहे हैं, तो उसने खुलासा किया कि वह कोई साधु-संत नहीं है, उसे सनातन धर्म के बारे में कोई जानकारी नहीं है। उसे कामकाज करना अच्छा नहीं लगता, इसलिए वेश धारण कर घूमने लगा। इससे अच्छी कमाई हो जाती है। लोग हाथ जोड़कर सम्मान करते हैं सो अलग! अब उत्तराखंड में ऐसे पाखंडियों का विचरण करना मुश्किल हो जाएगा। अन्य राज्य भी थोड़ी हिम्मत दिखाएं।

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