बांग्लादेश के मैमनसिंह शहर में कथित ईशनिंदा के आरोप में एक हिंदू व्यक्ति दीपूचंद्र दास को जिस बेरहमी से पीट-पीटकर मौत के घाट उतारा गया, वह घोर निंदनीय है। जब उग्र भीड़ का इससे भी मन नहीं भरा तो उसने शव को आग लगा दी। वहां खड़े लोग इस भयानक हत्याकांड के वीडियो बनाते रहे, सेल्फी लेते रहे और नारे लगाते रहे! कोई भी बचाने के लिए आगे नहीं आया। क्या बांग्लादेश दरिंदों का झुंड बनता जा रहा है? जो लोग एक इन्सान के साथ ऐसा सलूक कर सकते हैं, वे यकीनन इन्सान तो नहीं होंगे। इस मामले की कड़ी निंदा करते रहने से काम नहीं चलेगा। इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाना चाहिए। बांग्लादेश में अराजकता फैल चुकी है। वहां दरिंदों का बोलबाला हो गया है। वे चाहे जिसे जिंदा छोड़ते हैं, चाहे जिसे मारते हैं। इस देश पर कठोर प्रतिबंध लगाए जाएं। इसकी अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस वोटबैंक के दबाव और भारतविरोधी सोच के कारण उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं, लिहाजा सीमित सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला रखना चाहिए। दीपूचंद्र दास के साथ जो हुआ, उसे जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। याद करें, तीन दिसंबर, 2021 को पाकिस्तानी पंजाब के सियालकोट में एक श्रीलंकाई मैनेजर प्रियंथा कुमारा को भी ईशनिंदा के आरोप में कट्टरपंथियों ने इसी तरह मौत के घाट उतारा था। उसके बाद कई लोग उग्र भीड़ के हाथों मारे जा चुके हैं। अब बांग्लादेश भी पाकिस्तान के पदचिह्नों पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। दीपूचंद्र हत्याकांड के बाद मुहम्मद यूनुस ने वही रटा-रटाया बयान जारी कर दिया, जिसके वे अभ्यस्त हो चुके हैं। अब तक दर्जनभर लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
सवाल है- क्या अदालतें उन्हें सजा देने की हिम्मत दिखाएंगी? बांग्लादेश में यह चर्चा जोरों पर है कि उक्त कार्रवाई दिखावटी है। माना जा रहा है कि आरोपियों की गिरफ्तारी इसलिए की गई है, ताकि यूनुस यह दिखा सकें कि वे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। बाद में मुकदमे को इतना कमजोर बनाया जा सकता है, जिससे सभी आरोपी सबूतों के अभाव में अदालत से बरी हो जाएं। बांग्लादेश में कट्टरपंथी कितने बेलगाम हो गए हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 'इंकलाब मंच' के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद उन्होंने मीडिया के दफ्तरों में तोड़फोड़ कर आग लगा दी। एक अखबार के दफ्तर में काम कर रहे 30 से ज्यादा पत्रकारों ने किसी तरह भागकर अपनी जान बचाई, अन्यथा उग्र भीड़ उन्हें जिंदा जला देती। यह कैसा उन्माद है? इस दौरान अल्पसंख्यक परिवार अपने घरों में डरे-सहमे बैठे रहे। अगर उनका कोई भी सदस्य बाहर दिख जाता तो उसके साथ क्या होता? शरीफ उस्मान हादी को हमलावरों ने गोली मारी थी, जिनके खिलाफ कार्रवाई की मांग करना न्यायसंगत है, लेकिन इसके बजाय अपने देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, आग लगाना, देशवासियों का जीवन संकट में डालना कितना सही है? क्या बांग्लादेश भस्मासुर नहीं बनता जा रहा है? इसे अनुशासित करने के लिए भारत को सख्त कदम उठाने होंगे। मुहम्मद यूनुस तक यह संदेश पहुंचाना चाहिए कि इसी दिसंबर महीने में हमने बांग्लादेश को आजाद कराया था। अगर जरूरत पड़ी तो इसका नक्शा बदल देंगे। बांग्लादेशियों को इन्सानों की तरह रहने का सलीका सिखाया जाए। भारत की धरती पर जहां कहीं अवैध बांग्लादेशी पाए जाएं, उन्हें सख्त सजा देकर निकाला जाए। हमारा देश एक बड़ी आर्थिक और सैन्य ताकत है, कोई मजाक नहीं है। ढाका को इस ताकत का एहसास कराने का वक्त आ गया है।