भ्रष्टाचार पर एआई से प्रहार

आम लोगों के बीच यह धारणा है कि सरकारी काम में 'पैसा' लगता है

लेट-लतीफी, लालफीताशाही और 'ऊपरी कमाई' के बाकी दरवाजे बंद होने चाहिएं

दिल्ली सरकार द्वारा अपनी कई सेवाओं को 'फेसलेस' बनाने के लिए शुरू की गई मुहिम स्वागतयोग्य है। इससे पहले, ओडिशा सरकार ने वॉट्सऐप चैटबॉट शुरू किया था, जो 120 सेवाओं को सुलभ बनाएगा। देशभर में ऐसे नवाचारों की जरूरत है। पिछले एक दशक में सरकारी दफ्तरों से जुड़ीं सेवाओं में काफी सुधार हुआ है, लेकिन अभी और सुधार की जरूरत है। जब लोग छोटी-छोटी जरूरतों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते हैं तो इसमें काफी समय बर्बाद होता है। प्रक्रिया में जितनी ज्यादा जटिलताएं होंगी, भ्रष्टाचार के रास्ते भी उतने ही खुलेंगे। आज आम लोगों के बीच यह धारणा है कि सरकारी काम में 'पैसा' लगता है। यह पूरी तरह गलत नहीं है। कुछ अधिकारी और कर्मचारी अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार हैं, लेकिन भ्रष्टाचारियों की वजह से कई दशकों में जो माहौल बना है, उससे हर कोई अवगत है। जब देश का युवा सोशल मीडिया पर देखता है कि विदेशों में सरकारी दफ्तरों से जुड़ीं सेवाएं कितनी आसानी से और बगैर रिश्वत दिए मिलती हैं तो वह निराशा महसूस करता है। वह चाहता है कि हमारे देश में भी ऐसी सेवाएं शुरू की जाएं। अब दिल्ली और ओडिशा की सरकारों द्वारा की गई पहल में उम्मीद की किरण दिखाई देती है। इन सेवाओं का धीरे-धीरे इतना विस्तार किया जाए कि आम आदमी को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की जरूरत ही न पड़े। अगर फेसलेस और चैटबॉट सेवाएं प्रभावी ढंग से लागू की गईं तो ये भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में मददगार साबित होंगी।

यह एआई का दौर है। भारत को इसका नेतृत्व करना चाहिए। यह असंभव नहीं है। जिस देश में ज्यादातर लोग कुछ साल पहले तक इंटरनेट से परिचित नहीं थे, वे आज डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में नए कीर्तिमान बना रहे हैं! उनके तकनीकी ज्ञान से दुनिया हैरान है। अगर उन्हें सरकारी कामों के लिए एआई आधारित प्लेटफॉर्म मिलेंगे तो वे निश्चित रूप से बहुत बड़ा बदलाव लेकर आएंगे। भारतीय नागरिकों की खूबी है कि ये एक बार जो ठान लेते हैं, वह करके दिखाते हैं। सरकारी सेवाओं को ज्यादा सुलभ, पारदर्शी और तेज बनाने से समय और संसाधनों की बचत होगी। सरकार के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ेगा। याद करें, पहले किसानों और जरूरतमंद लोगों को मिलने वाली आर्थिक सहायता में कितना भ्रष्टाचार होता था? राष्ट्रीय राजधानी से जितनी धनराशि भेजी जाती थी, गांव तक पहुंचते-पहुंचते उसका बहुत बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचारी और बिचौलिए डकार जाते थे। जो थोड़ा-सा हिस्सा आम लोगों के लिए बचता था, उसे लेने के लिए भी बहुत पापड़ बेलने पड़ते थे। भ्रष्टाचारियों की खुशामद करनी पड़ती थी। उन्हें समय-समय पर फल, सब्जियां, अनाज, दूध, दही, घी और रुपए आदि देने पड़ते थे, ताकि भविष्य में कोई काम न अटके। अब सरकार बैंक खातों में धनराशि भेजती है। इस मामले में तो भ्रष्टाचारियों और बिचौलियों का खेल खत्म हो गया। अगर सरकार सौ रुपए भेजेगी तो किसान को सौ रुपए ही मिलेंगे। एक पैसा भी कम नहीं होगा। अब इससे आगे बढ़ने की जरूरत है। सरकारी दफ्तरों से जुड़ीं सभी सेवाओं को फेसलेस बनाते हुए लोगों तक उनका तेजी से प्रसार करना चाहिए, ताकि लेट-लतीफी, लालफीताशाही और 'ऊपरी कमाई' के बाकी दरवाजे भी बंद हो जाएं। जो सरकार यह कर दिखाएगी, वह जनता से समर्थन पाएगी। बस, इस बात का ध्यान रहे कि संबंधित प्लेटफॉर्म तकनीकी दृष्टि से सक्षम हों। उन्हें अपडेट करते रहें। प्लेटफॉर्म की हालत उन वेबसाइटों जैसी न हो जाए, जो न तो सही ढंग से खुलती हैं और न समय पर अपडेट होती हैं।

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