कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा एक मशहूर सोशल मीडिया कंपनी की याचिका को खारिज करते हुए की गई यह टिप्पणी कि 'हर संप्रभु राष्ट्र सोशल मीडिया को विनियमित करता है और भारत के इस कदम को किसी भी संवैधानिक कल्पना के दायरे में अवैध नहीं ठहराया जा सकता', ऐसी अन्य कंपनियों के लिए एक संदेश है। इन कंपनियों को भारत में व्यापार करना है, अपने उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ानी है, लेकिन नियम अपने चलाने हैं! ऐसा कैसे चलेगा? किसी भी कंपनी को अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर कुछ भी चलाने की छूट नहीं दी जा सकती। डेढ़ दशक पहले जब भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का विस्तार होना शुरू हुआ था, तब लोगों का मानना था कि ये दुनिया को जोड़ने का सबसे बड़ा माध्यम साबित होंगे। बेशक सोशल मीडिया ने एक हद तक यह काम बखूबी किया। जल्द ही इन प्लेटफॉर्म्स की खामियां सामने आने लगीं और विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकारों के साथ इनका टकराव होने लगा। प्राय: ये कंपनियां तर्क देती हैं कि हम तो एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराते हैं, कोई उपयोगकर्ता यहां क्या डालता है, यह उसके विवेक पर निर्भर करता है। हालांकि जब सरकार किसी आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए कहती है तो ये अपनी प्रतिबद्धताओं का हवाला देते हुए आनाकानी करने लगती हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे कई अकाउंट हैं, जिन पर लोगों ने भड़काऊ, अभद्र और आपत्तिजनक सामग्री डाल रखी है। जब उनकी शिकायत की जाती है तो ये कंपनियां तरह-तरह के नियम गिनाते हुए न तो वह सामग्री हटाती हैं और न ही उन अकाउंट्स तक पहुंच को अवरुद्ध करती हैं। एक कंपनी तो अभिव्यक्ति की इतनी बड़ी पैरोकार होने का दावा करती है कि घोर अश्लील सामग्री भी नहीं हटाती। शिकायत करने वाले को प्लेटफॉर्म की ओर से नियमों का पुलिंदा भेज दिया जाता है, जिसकी भाषा समझ से परे होती है।
सोशल मीडिया ने फेक न्यूज को इतनी हवा दी है कि अब लोग सही ख़बर पर भी शक करने लगे हैं। यहां ऑनलाइन ठगी के अड्डे धड़ल्ले से चलते हैं। कभी लॉटरी निकलने, कभी पार्ट-टाइम जॉब, तो कभी धन दोगुना-चौगुना करने वाली फर्जी स्कीमों के दावे इनके जरिए खूब किए जाते हैं। इन कंपनियों को ऑनलाइन अपराधों पर नजर रखते हुए ऐसी मजबूत प्रणाली विकसित करनी चाहिए थी, जो उपयोगकर्ताओं के धन और निजता की सुरक्षा करे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तानी और चीनी ठगों ने इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हुए कई भारतीय नागरिकों की कमाई उड़ा ली, उन्हें हफ्तों ब्लैकमेल करते रहे। इन अकाउंट्स के असामान्य व्यवहार को देखते हुए कंपनियों को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। ये कंपनियां जब शक्तिशाली हो जाती हैं तो सरकारों को खुलकर चुनौती देती हैं। कई देशों में इन पर हिंसा, उपद्रव और रक्तपात के जरिए सत्ता परिवर्तन कराने के आरोप लग चुके हैं। वास्तव में सोशल मीडिया उस तलवार की तरह है, जो दूसरों के साथ ही इसे चलाने वाले को भी नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जब सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि किसी व्यक्ति के लिए बड़ी मुसीबत बन गई। इन प्लेटफॉर्म पर अभिव्यक्ति की आज़ादी जरूर हो, लेकिन वह कानून के दायरे में हो। आज़ादी अपने साथ कुछ फ़र्ज़ भी लेकर आती है। उन्हें निभाना जरूरी है। हमें इन विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता कम करनी चाहिए। भारत के पास अपना सर्च इंजन, अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और मैसेजिंग ऐप होने ही चाहिएं। विदेशी कंपनियों पर निर्भरता के कई खतरे हैं, जिनसे हमें सावधान रहना चाहिए।