स्वच्छता के क्षेत्र में कीर्तिमान रच चुके इंदौर शहर ने 'नो कार डे' मनाकर एक और मिसाल कायम कर दी है। देश के अन्य शहर और गांव भी इससे बहुत कुछ सीख सकते हैं। इंदौरवासियों ने 'नो कार डे' मनाते हुए लगभग 80,000 लीटर पेट्रो ईंधन की बचत की है। इसका फायदा इंदौरवासियों को मिलेगा। आज जिस तरह वायु प्रदूषण एक गंभीर समस्या बनती जा रही है, उसके मद्देनज़र इंदौर का यह प्रयोग हमें नई राह दिखा सकता है। इस दिन राजनेता और पुलिस अधिकारी साइकिल चलाते नजर आए। कई उच्चाधिकारी इलेक्ट्रिक वाहन चलाकर अपने दफ्तर पहुंचे। कुछ न्यायाधीशों ने भी कार का इस्तेमाल नहीं किया। अगर लोग ठान लें तो कुछ भी असंभव नहीं है। वे अपने शहर को देश का सबसे स्वच्छ शहर बना सकते हैं। अगर वे प्रतिज्ञा कर लें तो अपने शहर की हवा को सबसे साफ बनाने की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। 'नो कार डे' की तर्ज पर कुछ और डे भी मनाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, कई लोग दिन-रात अपने मोबाइल फोन के साथ व्यस्त रहते हैं। अगर वे चिंतन करेंगे तो पाएंगे कि जरूरी काम के लिए सीमित उपयोग पर्याप्त होता है। उनका काफी समय ऐसी सामग्री देखने में गुजर जाता है, जो उपयोगी नहीं होती है। इसे ध्यान में रखते हुए हफ्ते या पखवाड़े में एक दिन 'नो मोबाइल फोन डे' मनाना चाहिए। उस दिन बहुत जरूरी होने पर ही फोन देखें। यह नहीं होना चाहिए कि बचा हुआ समय टीवी या ओटीटी को भेंट कर दें। उस दिन या तो अपना काम करें या कोई अच्छी पुस्तक पढ़ें।
प्राय: लोग जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, प्लास्टिक कचरा, जंक फूड के बढ़ते चलन, संसाधनों का अपव्यय जैसी समस्याओं का जिक्र तो खूब करते हैं, लेकिन सुख-सुविधाएं नहीं छोड़ पाते। हमें कुछ हौसला दिखाते हुए गर्मियों में 'नो एसी डे' भी मनाना चाहिए। महीने में कोई एक दिन ऐसा होना चाहिए, जब हम बिजली से चलने वाले सभी उपकरणों का कम से कम इस्तेमाल करें। पिछले दो दशकों में प्लास्टिक कचरा इतना ज्यादा फैल गया है कि कई समुद्री जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। क्या हम 'नो प्लास्टिक डे' मनाकर सिंगल यूज़ प्लास्टिक की जगह पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपना सकते हैं? जंक फूड को छोड़ पाना आसान नहीं होता है। कई लोग तो डॉक्टर की सलाह के बाद भी इसे नहीं छोड़ पाते। हालांकि संयम के अभ्यास से यह संभव है। हम 'नो जंक फूड डे' मनाकर अपने लिए ही भलाई करेंगे। अगर गौर करेंगे तो पाएंगे कि कुछ वर्षों में शोरगुल की मात्रा में काफी बढ़ोतरी हुई है। कई ड्राइवर अकारण ही वाहन का हॉर्न बजाते हैं। कुछ लोग लाउडस्पीकर पर उच्च डेसिबल पर गाने आदि बजाते हैं। उस समय ऐसा लगता है कि इन्होंने पूरे मोहल्ले को गाना सुनाना अपना कर्तव्य समझ लिया है! अगर हफ्ते में कोई एक दिन ऐसा हो, जब बग़ैर जरूरत कोई ड्राइवर हॉर्न न बजाए और लाउडस्पीकर शांत रहें तो वातावरण में बहुत शांति होगी। आज नकारात्मकता भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। सोशल मीडिया से लेकर समाचार चैनलों तक, बहुत कम सकारात्मक बातें देखने-सुनने को मिलती हैं। हर जगह नकारात्मकता ज्यादा फैली हुई है। कई लोग तो वर्षों पहले हुई घटना को याद कर अपना पूरा दिन खराब कर लेते हैं। क्या ही अच्छा हो, अगर हम 'नो नेगेटिविटी डे' मनाएं। उस दिन सिर्फ सकारात्मक बातों का जिक्र करें, सकारात्मक ही सोचें! जीवन की कई समस्याओं का समाधान तो हम इसी तरह ढूंढ़ सकते हैं। बस, दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प की जरूरत है।