विदेश मंत्री एस जयशंकर के ये शब्द रावलपिंडी और इस्लामाबाद तक जरूर पहुंचे होंगे कि आतंकवाद का ‘कैंसर’ अब पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था को निगल रहा है और सीमा पार आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने के कारण वह ‘अलग-थलग’ पड़ा हुआ है। बेशक दहशत के सौदे ने ही पाकिस्तान को सबसे ज्यादा तबाह किया है। इस पड़ोसी देश पर जौन एलिया के ये शब्द पूरी तरह लागू होते हैं- 'मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस.. ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं!' पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो चुकी है। वहां कट्टरपंथ और आतंकवाद का बोलबाला है। उसकी मुद्रा में भारी गिरावट आ चुकी है। क्या पाकिस्तान इससे सबक लेगा? क्या भारत के लिए आतंकवाद संबंधी चुनौतियां कम होंगी? अगर पिछले अनुभवों को याद करें तो निकट भविष्य में इसकी कोई संभावना नहीं है। इस समय भारत को पाकिस्तान की घेराबंदी ज्यादा मजबूत करनी चाहिए। वह जिन स्रोतों से धन अर्जित कर उसका इस्तेमाल आतंकवाद की आग भड़काने के लिए करता है, इसके पुख्ता प्रमाण जुटाकर उसे एफएटीएफ की ब्लैक लिस्ट में पहुंचाने के लिए भरपूर कोशिशें करनी चाहिएं। भले ही पाकिस्तान के लिए आर्थिक मोर्चे पर खासी तंगहाली है, लेकिन न उसके मंसूबे बदले हैं और न उसने अपनी ज़िद छोड़ी है। पहले, पाकिस्तान आतंकवाद संबंधी अपनी खुराफातों को अंजाम देने के लिए जो तौर-तरीके अपनाता था, अब उनमें बहुत बदलाव आ गया है। इंटरनेट और ड्रोन, ये दो ऐसे माध्यम हैं, जिनके जरिए वह गड़बड़ करने की कोशिशें करता रहता है। एक तो इनमें जोखिम बहुत कम है, दूसरे इनका दायरा बहुत बड़ा किया जा सकता है।
बांग्लादेश के साथ पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी भी एक खतरा है। हाल में ढाका ने पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वीजा संबंधी नियम आसान कर दिए। बांग्लादेश और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच 'सहयोग' बढ़ाने की चर्चा हो रही है। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश जिस दिशा में जा रहा है, उससे पाकिस्तानी कट्टरपंथी संगठनों के अलावा आईएसआई के लिए भी ढाका 'उपजाऊ' ज़मीन साबित हो सकता है। चूंकि इस समय बांग्लादेश सियासी तौर पर उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। मौजूदा सरकार की पकड़ बहुत कमजोर है। यूनुस ऐसा कोई फैसला नहीं लेना चाहते, जिससे कट्टरपंथी संगठन उनके खिलाफ भी मोर्चा खोल दें। अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना बांग्लादेशी कट्टरपंथियों के अलावा आईएसआई की आंखों में भी खटकती थीं। जब वे स्वदेश छोड़कर भारत आईं, पाकिस्तानी फौज के सेवानिवृत्त अधिकारी टीवी स्टूडियो में खुशियां मनाते देखे गए थे। शेख हसीना को सत्ता से हटते देखना आईएसआई का पुराना ख्वाब था, जो दुर्भाग्य से पूरा हो गया। अब इस्लामाबाद से 'सहयोग बढ़ाने' के नाम पर ढाका साजिशों का नया अड्डा बन सकता है। बेशक पाकिस्तान अपनी आतंकवादी हरकतों के कारण ‘अलग-थलग’ पड़ा है। हाल में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने बड़ी संख्या में पाकिस्तानियों के वीजा आवेदन खारिज किए थे। खाड़ी देशों में पाकिस्तानियों के आगमन की शर्तें कड़ी कर दी गई हैं। इससे पाक के विदेशी मुद्रा भंडार को तगड़ी चोट पहुंची है। दूसरी ओर मालदीव, बांग्लादेश और चीन जैसे देशों के साथ पाकिस्तान की नजदीकी 'साजिशी नेटवर्क' बना रही है। इनमें से चीन के साथ उसके आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। 'भारतविरोध' इन तीनों के साथ जुड़ने की असल वजह है। इसलिए पाकिस्तान कितना ही ‘अलग-थलग’ पड़ जाए, उसकी अर्थव्यवस्था को नुकसान हो जाए, विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो जाए, उसकी 'गतिविधियां' जारी रहेंगी, जिनका असरदार ढंग से जवाब देने के लिए भारत को राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, सैन्य और हर मोर्चे पर पूरी तैयारी के साथ सतर्क रहना होगा।