वाट्सएप पर आपस में मैसेज देने से नहीं पड़ेंगे वोट

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घरों से मतदान के लिए निकलने और दूसरों को प्रेरित करने से बनेगी बात

बेंगलूरु/दक्षिण भारत
श्रीकांत पाराशर

लोकसभा चुनाव जिसे आम चुनाव भी कहा जाता है, मूलतः राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा जाता है। देश की प्रगति, देश की सरहदों पर सुरक्षा, विदेश नीति, देश की आर्थिक स्थिति, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की अक्षुण्णता, भारतीय संस्कृति और सामाजिक ढांचे को चरमराने से बचाने, देश का नेतृत्व किसी विजन वाले नेता के हाथों में हो, जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चिंतन मनन करके वोट दिया जाता है।

गली के गड्ढों, मोहल्ले की स्ट्रीट लाइट, नालियों की सफाई, बिजली की दरों पर सांसद नहीं चुना जाता। आप अपने संसदीय क्षेत्र में जिसे विजयी बनाते हैं उस सांसद की अहमियत होती है देश का नेतृत्व चुनने की। आज विभिन्न राजनीतिक दल इस चुनावी अखाड़े में ताल ठोक कर तैयार हैं।

पूरे देश में विभिन्न चरणों में होने वाले मतदान में एक चरण का मतदान हो चुका है और 18 अप्रैल को दूसरे चरण में कर्नाटक और तमिलनाडु भी शामिल हैं। कर्नाटक में 23 अप्रैल को भी 14 सीटों पर मतदान होगा। इस बार मतदाता के समक्ष बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। उसे अपने क्षेत्र से ऐसे सांसद को चुनकर भेजना है जो देश के लिए एक सशक्त नेतृत्व को चुन सके क्योंकि ऐसा नेता कौन हो सकता है इस पर चिंतन करके ही मतदान बूथ की ओर निकल पड़ना है।

बहुत से लोग जागरूकता अभियान चला रहे हैं, छोटी-छोटी गेट टुगेदर भी कर रहे हैं परंतु बहुत सारे लोग वाट्सएप पर ही एक दूसरे को सलाह देने में दिन रात एक किए हुए हैं। देखा जाए तो गुरुवार को मतदान के दिन ज्यादा काम है। सबसे बड़ा काम है वाट्सएप करने वाले सक्रिय नागरिक और अपनी अपनी पार्टी के हितैषी रोजाना के अपने शिड्यूल से थोड़ा पहले बिस्तर से उठें ताकि अपनी व्यस्तताओं में खुद मतदान का एक घंटा निकाल सकें।

अपने परिवारजनों को प्रेरित कर सबको साथ लेकर उस दिन सुबह सबेरे, जितना जल्दी हो, मतदान बूथ पर पहुंच जाएं ताकि इस महत्वपूर्ण दायित्व का जल्दी निर्वहन कर निश्चिंत हो सकें। हालांकि अब बूथ लेवल पर भी पहले से ज्यादा बेहतर और दुरुस्त व्यवस्थाएं हो गई हैं इसलिए सहज ही आपका वोट कोई और देकर नहीं जा सकता परंतु दूसरों का वोट देने वाले चतुरों (फर्जी वोटरों) की चतुराई का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। वे अभी भी आपका वोट देकर निकल लें तो कोई बड़ी बात नहीं।

अच्छा है कि हम अपने मताधिकार का समय रहते खुद उपयोग कर लें और विलंब से बूथ पहुंचकर होनेवाली अपनी संभावित फजीहत से बच जाएं। कुछ समय से देखने में आ रहा है कि पार्टी में अपनी धाक जमाने या फिर पार्टी के प्रति सहयोग के भाव से लोग उम्मीदवार सम्पर्क सभाएं करवा रहे हैं। अच्छा है, इनकी सराहना करनी चाहिए परंतु यह कहने में भी कैसी हिचक कि ऐसी छोटी बड़ी बैठकें या गेदरिंग ऐसे ऐसे लोग भी कर रहे हैं कि उनको ही सोसायटी में कोई जानता नहीं। कुछ ऐसे हैं जो अपनी पसंद के नेता को गेदरिंग के जरिए प्रभावित तो करना चाहते हैं, और नेता भी सोचता है कि बैठे बिठाए थोड़ी भीड़ मिल जाएगी तो अपनी बात रख देंगे। परंतु भीड़ जुटा नहीं पाते। कारण, लोग आजकल नेताओं से ज्यादा व्यस्त और ज्यादा चतुर हैं। वे ऐसे आयोजनों के लिए उपस्थिति की हामी तो भर देते हैं परंतु पहुंचते नहीं।

एक तो शहर का ऊबाऊ ट्रैफिक और दूसरा मंदा चल रहा धंधा। मूड ही नहीं बनता। उत्साह कहां से लाएं? देश के प्रति लोगों में कुछ करने का जोश तो दिखाई देता है परंतु अनजान से आयोजकों के निमंत्रण पर उनका जोश ऊफान पर नहीं आ पाता। आयोजक सोचता है कि डेढ़ सौ लोग तो आ ही जाएंगे, सूची में पक्के विश्वास के साथ टिक लगाने पर भी गेदरिंग में जब चेहरे गिनने लगते हैं तो 35-40 से आगे नहीं बढ़ पाते। दोष किसी का नहीं है। सब अपनी अपनी जमाने में लगे हैं। सबके अपने अपने स्वार्थ हैं। जिनका कोई स्वार्थ नहीं है उनका नाम आयोजकों के साथ जोड़ तो दिया जाता है परंतु अकली तीन होर्सपावर की मोटर कितना वजन खींच सकती है।

वैसे सबको पता है कि वोट तो शीर्ष राष्ट्रीय नेताओं के भरोसे ही मिलने हैं। बस चुनाव हैं, तो चहल पहल भी रहनी चाहिए इसलिए सब अपने अपने ढंग से लगे हैं। सब जानते हैं कि जो पार्टी के लिए कम्मिटेड हैं वे तो उस पार्टी को ही वोट देंगे। जो थोड़े बहुत ऐसे हैं कि निर्णय लेने में देरी करते हैं या थोड़े से ढुलमुल हैं या फिर यों भी कह सकते हैं कि ठीक से कसौटी पर कसकर ही वोट देने वाले होते हैं, बस पार्टियों की नजर उनको प्रभावित करने की होती है।

समझदार उम्मीदवार वहीं मेहनत करता है। जो मतदान के दिन घर पर देर से उठते हैं, एक बार से ज्यादा नाश्ता करते हैं, टीवी के सामने बैठे बैठे बार बार चाय पीते हैं और दोपहर का खाना खाते खाते साढे तीन-चार बजा देते हैं वे अंत में वोट देने नहीं जाते क्योंकि उन्हें लगता है अब बहुत देर हो गई, वोट की लाइन में लग भी गए तो नंबर नहीं आएगा (हालांकि मतदान केंद्र पर नंबर सबका आता है), ऐसे आलसी, बेपरवाह लोगों के कारण गलत उम्मीदवार चुनकर आता है क्योंकि यह बुद्धिमान, जागरूक मतदाता होता है।

सरकार की खामियों को पकड़ने और उसकी समीक्षा करने की सामर्थ्य इसी वर्ग में होती है। यही सबसे ज्यादा सलाह सबको देता है परंतु खुद वोट देने नहीं जाता। आशा करनी चाहिए कि इस बार हर वर्ग, हर विचार के लोग वोट देने जाएंगे क्योंकि बाद में सरकार को गालियां देने से बेहतर है मतदान के दिन वोट देना।

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