मेजर शैतान सिंह: रेजांग ला के नायक, जिनकी हुंकार के बाद मारे गए 1800 चीनी फौजी

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नई दिल्ली/दक्षिण भारत। भारत ने हमेशा अपने हर पड़ोसी मुल्क से दोस्ताना संबंधों के लिए हाथ बढ़ाए हैं। शांति के उपासक रहे भारत को पाकिस्तान से तो धोखा मिला ही, चीन ने भी विश्वासघात किया। ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा देकर 1962 में पीठ में छुरा घोंपने वाले चीन के हमले का हमारे जांबाजों ने बहुत बहादुरी के साथ जवाब दिया था। पुराने हथियारों और अपर्याप्त साजो-सामान के बावजूद हमारे वीर जवान अपने हौसले की बदौलत मोर्चे पर मजबूती से खड़े रहे और देश के लिए बलिदान हो गए।

भारत मां के सपूत मेजर शैतान सिंह का जीवन हमारे लिए प्रेरणास्रोत है। एक दिसंबर, 1924 को राजस्थान के जोधपुर जिले के बानासर गांव में जन्मे शैतान सिंह ने जोधपुर से मैट्रिक की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने 1947 में स्नातक किया। वे 1 अगस्त, 1949 को जोधपुर राज्य बल में भर्ती हो गए। जोधपुर रियासत का भारत में विलय होने के बाद शैतान सिंह को कुमाऊं रेजिमेंट में स्थानांतरित कर दिया गया। उन्होंने नागा हिल्स ऑपरेशन और गोवा के भारत में विलय अभियान में भाग लिया। इसके बाद 11 जून, 1962 को उन्हें मेजर पद पर पदोन्नत किया गया।

उसी साल मेजर शैतान सिंह को सी कंपनी की कमान सौंपते हुए रेज़ांग ला में तैनात किया गया। यह समुद्र तल से करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में चुशूल घाटी के दक्षिणपूर्व में यह पहाड़ी दर्रा सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 18 नवंबर, 1962 की सुबह यहां चीनी सेना ने हमला किया था। जवाबी कार्रवाई में 13 कुमायूं बटालियन की ‘सी’ कंपनी ने भी हमला बोला, जिसमें चीन के कई फौजी मारे गए।

इस इलाके में भारत के 123 जवान चीन के करीब 5,000 जवानों से मुकाबला कर रहे थे। चीनी फौज पर्याप्त हथियारों के साथ आई थी। उस समय मेजर शैतान सिंह को वरिष्ठ अधिकारियों से संदेश मिला था कि अभी उनके पास मदद पहुंचने में समय लगेगा। चाहें तो चौकी छोड़कर पीछे हट जाएं। इसके बाद मेजर ने अपने टुकड़ी के साथ बातचीत की तो हर जवान ने उन पर भरोसा जताया और देश की रक्षा के लिए वहीं तैनात रहने का संकल्प दोहराया।

जब लड़ाई छिड़ी तो चीन ने भारी हथियारों से हमला किया। तोप और मोर्टार के धमाकों से यह इलाका थर्रा उठा। इस लड़ाई में यहां तैनात हमारे ज्यादातर जवान शहीद हो गए और कुछ गंभीर रूप से घायल हुए। जब सैनिकों के पास असलहा-बारूद खत्म हो गया तो उन्होंने हथियारबंद चीनी फौजियों के साथ हाथों से लड़ाई की। एक जवान को बचपन से ही कुश्ती का शौक रहा था। उसने चीन के कई फौजियों को उठा-उठाकर पटका और मारा।

मेजर शैतान सिंह पूरी ताकत के साथ गोलीबारी कर रहे थे और अपनी टीम का हौसला बढ़ा रहे थे। उन्होंने दुश्मन के कई जवानों को मार गिराया। इसी दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बावजूद गोलीबारी जारी रखी। उनके शरीर से खून बह रहा था। उन्होंने सैनिक को आदेश दिया कि मशीनगन के ट्रिगर को रस्सी के जरिए उनके पैर से बांध दे। चूंकि उनके दोनों हाथ लहूलुहान हो गए थे। इसके बाद मेजर ने रस्सी की सहायता से फायरिंग शुरू की और आखिरी सांस तक देश की रक्षा करते रहे।

एक रिपोर्ट के अनुसार, उस लड़ाई में मेजर शैतान सिंह की टुकड़ी के 114 जवान शहीद हुए। वहीं चीन को भी बहुत बड़ा नुकसान हुआ। अत्याधुनिक हथियारों से लैस उसके 1,800 जवान वहां मारे गए और बाकी उलटे पांव लौटने को मजबूर हो गए। करीब तीन माह बाद जब बर्फ पिघली तो सेना और रेड क्रॉस सोसायटी का दल इधर आया। उन्हें मेजर शैतान सिंह का शव मिला। इस जांबाज ने तब भी मशीनगन थाम रखी थी। देश के इस वीर सपूत को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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