भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कभी नहीं भुलाया जा सकेगा मैसूरु का ‘चंद्रा’

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मैसूरु/दक्षिण भारत। कर्नाटक के मैसूरु में 17 मई 1945 को जन्मे भागवत सुब्रमण्यम चंद्रशेखर का दाहिना हाथ बचपन से ही पोलियो से ग्रस्त होने के कारण कमजोर और लचीला हो गया था। मगर दिल में कुछ कर गुजरने की ललक और इरादा मजबूत हो तो लोग ऐसी लकीर खींचने में सफल हो जाते हैं, जिसे छोटा कर पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। अपनी शारीरिक कमजोरी को किस खूबी से गुण में तब्दील किया जा सकता है यह कोई भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व खिलाड़ी और स्पिन गेंदबाजी के जादूगर चंद्रशेखर से सीखे।

यदि लाजवाब और बेमिसाल होना कला का आवश्यक गुण है तो भागवत चंद्रशेखर यकीनन एक कलाकार थे। सुभाष गुप्ते के बाद चंद्रशेखर आजाद भारत के दूसरे ऐसे गेंदबाज थे जिनकी गेंदबाजी का लोहा सभी बल्लेबाज मानते थे। वह उस जमाने में अपने दम पर किसी भी मैच का रुख पलटने की ताकत रखते थे, जिस समय अंग्रेज और वेस्ट इंडीज के धारदार तेज गेंदबाजों का पूरी क्रिकेट दुनिया पर राज हुआ करता था।

चंद्रशेखर एक ‘फ्रीक’ बॉलर थे। उनकी विशेषता स्पिन में नहीं, ‘रफ्तार’ और ‘बाउंस’ में थी। चंद्रा की गेंदबाजी पश्चिमी बल्लेबाजों के लिए हमेशा रहस्यमयी बनी रही। 60 के दशक में भारत की मशहूर स्पिन चौकड़ी (चंद्रा, बेदी, प्रसन्ना, वेंकटराघवन) में से एक रहे चंद्रा लंबी बाउंसिंग रन-अप के बाद तेज गुगली फेंकते थे। उन्हें लेग स्पिनर कहा गया, लेकिन गेंदबाजी की गति और तेजी से हाथ घुमाकर फ्लाइट न कराने की शैली लेगस्पिन तकनीक के विपरित थी। चंद्रशेखर अधिकतर गेंदें ऑफ ब्रेक फेंका करते इसलिए उन्हें तेज गति का गुगली गेंदबाज कहा जाए तो ज्यादा फिट होगा।

पोलियो की वजह से गेंद फेंकते वक्त उनकी कलाई ज्यादा मुड़ जाती थी, जो उन्हें सामान्य स्पिनरों से अलग करती थी। 58 टेस्ट में 15,963 गेंद फेंककर 29.74 की औसत से 242 विकेट चटकाने वाले चंद्रशेखर को पोलियो ग्रस्त हाथ से गेंदबाजी करने और लाइन-लेंथ को नियंत्रित करने के लिए कितने अभ्यास की जरूरत प़डी होगी इसका अंदाजा हम शायद ही लगा पाएं। कर्नाटक की ओर से रणजी ट्रॉफी खेलने वाले इस खिलाड़ी को हिंदी नहीं आती थी, मनमौजी और शायराना तबीयत के चंद्रशेखर मुकेश के गमगीन गीतों के बेहद शौकीन थे और बेगम अख्तर की गजलें भी खूब सुना करते थे।

इस शौक में कर्नाटक के ही एक शानदार बल्लेबाज जीआर विश्वनाथ उनका बराबरी से साथ देते। अंग्रेजों के खेल में फिरंगियों को हराने का सुखद अहसास हिंदुस्तान को पहली बार वर्ष 1971 में मिला, जब भारत ने ओवल टेस्ट में जीत की नई इबारत लिखी। उस टेस्ट में चंद्रशेखर ने 38 रन देकर ६ विकेट हासिल किए, जिससे इंग्लैंड की दूसरी पारी 101 रन पर सिमट गई। उस दिन चंद्रशेखर अपने पूरे शबाब पर थे। ऐसा लग रहा था मानो उस दिन अंग्रेज बल्लेबाज इस भारतीय की उंगलियों पर नाच रहे थे।

चंद्रशेखर की गेंदबाजी का विश्लेषण था 18.1-3-38-6। इंग्लैंड के खिलाफ ही वर्ष 1972-73 में जब बिशन सिंह बेदी 96, वेंकट राघवन 82 और चंद्रशेखर 75 टेस्ट विकेट पर थे तब सभी को यही लग रहा थी कि इन तीनों में में बेदी सबसे पहले टेस्ट विकेटों का शतक पूरा करेंगे। मगर हुआ क्या? इन स्पिनर्स में से चंद्रशेखर ने ही अपने 100 टेस्ट विकेट पूरे किए। चंद्रशेखर कुछ भी कर सकते थे। चंद्रशेखर ने अपना एकमात्र वन-डे न्यूजीलैण्ड के खिलाफ खेला जिसमें उन्होंने 3 विकेट लिए। इनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए उन्हें 1972 में विज्डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर का अवॉर्ड दिया गया।

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