पूरी जिन्दगी संंबंध बनते और बिगड़ते हैं : गणिवर्य पद्माचन्दसागर

0

दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कचेन्नई। यहां के साहुकारपेट स्थित श्री जैन आराधना भवन में विराजित गणिवर्यश्री पद्मचंद्र सागरजी म.सा. ने ललित विस्तरा ग्रंथ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अहंकार उसे कहते हैं कि जो हमारा नहीं है, उसे हम अपना मानते हैं और बाहरी पदार्थों को भी अपना मानते हैं। सभी रिश्तों में झग़डे हो सकते हैं, सिर्फ मित्रता के संबंध में झग़डा नहीं होता। देव, तिर्यंच, नारक गति में संबंध या तो नगण्य होते हैं, अथवा अल्प होते हैं, सिर्फ मनुष्य ही अपनी पूरी जिंदगी संबंध बनाता है और तो़डता है। अहंकार को तो़डना यानी पराये को पराया मानना, और अपने को अपना मानना। अपूर्ण और अशुद्ध ज्ञान से अहंकार पैदा होता है। व्याख्यान देनेवाला ‘पराशय वेदी‘ होना चाहिए, यानी श्रोता के आशय को जाननेवाला। अधम भक्त वो होता है जो भगवान की भक्ति तो उत्कृष्ट कोटि की करता है, मगर भगवान के भक्तों के साथ उचित और अच्छा व्यवहार नहीं करता। मध्यम कोटि वाला भक्त परमात्मा के प्रति प्रेम रखेगा, भक्तों का भी उचित आदर करेगा, पापियों के प्रति तटष्ठ रहेगा और दुखी जनों के प्रति करुणा रखेगा। उत्कृष्ट भक्त वो होता है जो परमात्मा में दुनिया और दुनिया के तमाम जीवों में परमात्मा को देखता है।

LEAVE A REPLY