मुदहोल/दक्षिण भारतबागलकोट जिले में अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों के लिए आरक्षित मुदहोल विधानसभा सीट को भाजपा का पारंपरिक राजनीतिक किला माना जाता है। वहीं, इस वर्ष १२ मई को होने जा रहे विधानसभा चुनाव में इस सीट के नतीजे चोंकाने वाले साबित हो सकते हैं। कांग्रेस प्रत्याशी के नाम पर यहां असंतोष की चिंगारी धधक रही है। अंदेशा जताया जाने लगा है कि आम तौर पर कांग्रेस को समर्थन देने वाले मुस्लिम मतदाता इस असंतोष से दो फा़ड हो जाएं। अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से इसका फायदा जनता दल (एस) को मिलेगा। इस सीट के मतदाताओं से बातचीत में यह साफ हो जाता है कि यहां सिद्दरामैया सरकार से लोगों के मन में खासी नाराजगी है। वर्ष २०१५ में हुए सांप्रदायिक दंगों की आग में यह क्षेत्र झुलस चुका है। उस वर्ष हिंदुओं और मुस्लिमों में दो बार हिंसक टकराव हुआ था। पहली बार स्थानीय हिंदुओं की देवी दुर्गव्वा की एक शोभायात्रा के दौरान दोनों समुदायों के बीच हुई झ़डप ने ब़डी हिंसा का रूप ले लिया था। वहीं, शहर के जनता कॉलोनी इलाके में गणेश विसर्जन के दौरान उसी वर्ष हिंसक संघर्ष हुए थे। उस संघर्ष में मुस्लिम समुदाय के कारोबारियों की लगभग ७० दुकानें फूंक दी गई थीं। स्थानीय मुस्लिमों का कहना है कि उनकी मदद के लिए कांग्रेस सरकार ने कुछ भी नहीं किया था। कारोबारियों को हिंसा में हुए नुकसान का कोई मुआवजा तक नहीं दिया गया था। इसे पुलिस और सिद्दरामैया सरकार की सबसे ब़डी नाकामी मानते हुए ५० वर्ष उम्र के ऑटोरिक्शा चालक इकरामुद्दीन अकबरअली कहते हैं, ’’हमने उस संघर्ष के दौरान भारी नुकसान उठाया। दो महीने पहले राहुल गांधी यहां के दौरे पर आए थे। उस दौरान कांग्रेस नेताओं ने खुद को मुस्लिमों के रक्षक के तौर पर पेश करने की कोशिश की। यह बेहद दुखद स्थिति है।’’अकबरअली की बातों से स्थानीय बाशिंदों में से कई लोग सहमत हैं। वह बताते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा पर लगाम कसने में कांग्रेस सरकार की नाकामी से मुदहोल विधानसभा सीट पर इसकी जीत की संभावनाओं पर आंच आना लाजमी होगा। एक आईटी कंपनी में काम करने वाले स्थानीय मतदाता मंतेश निंबालकर का कहना है कि भाजपा इस सीट पर लगातार चुनाव जीतती रही है लेकिन वर्ष २०१३ के चुनाव में इसके प्रत्याशी की जीत का फासला मात्र ५ हजार मतों पर आ गया था। यह आंक़डा वर्ष २००८ के चुनाव से काफी कम था। इससे पूर्व कांग्रेस प्रत्याशी रामप्पा बालप्पा तिम्मापुर को भाजपा प्रत्याशी गोविंद एम करजोल ने वर्ष २००४ के चुनाव में ३१ हजार मतों से शिकस्त दी थी। वर्ष २००८ के चुनाव में जीत का फासला सिर्फ ७ हजार मतों पर सिमट गया और पांच वर्ष पहले इसमें और दो हजार मतों की कमी आई। इसका अर्थ साफ है कि यहां भाजपा के जनाधार में छीजत आई है और इसके लिए वर्ष २०१५ के दंगे प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। जनता दल (एस) ने इस वर्ष के चुनाव में शंकर नायक को इस सीट पर अपना प्रत्याशी बनाया है। वह कहते हैं, ’’इस बार के चुनाव में मेरे पक्ष में जोरदार समर्थन जुट रहा है। मैं पहले भी यहां से चुनाव ल़ड चुका हूं लेकिन इस बार स्थानीय मुस्लिम मतदाता पूरी तरह से मेरे पक्ष में हैं। वर्ष २०१५ में हुए दो-दो सांप्रदायिक दंगों से निपटने में कांग्रेस सरकार की नाकामी यहां कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं पर बेहद भारी प़डने वाली है। उसके मुस्लिम जनाधार में तेजी से कमी आई है।’’ उन्होंने दावा किया कि उस दंगे में राज्य की कांग्रेस सरकार मुस्लिमों की कोई मदद नहीं कर सकी थी। उनके इस दावे से मुदहोल की जनता दल (एस) इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष नबी गलगली पूरी तरह से सहमत हैं। उनका आरोप है, ’’कांग्रेस ने मुस्लिमों की सुरक्षा सहित इस समुदाय से जु़डे सभी मुद्दों की अनदेखी करने की आदत बना ली है। वर्ष २०१५ में गणपति विसर्ज के दौरान हुए दंगों में इस पार्टी की सरकार मुस्लिमों की हालत के बारे में पूरी तरह से उदासीन बनी रही। दंगाइयों ने मुस्लिमों की ७० दुकानों में आगजनी की।’’ उन दंगों की टीस यहां के मुस्लिमों में आज भी इतनी गहरी है कि वह छोटे-मोटे राजनीतिक सभाओं के दौरान कांग्रेस छो़डकर सामूहिक रूप से जनता दल (एस) की सदस्यता हासिल कर रहे हैं।गौरतलब है कि कांग्रेस ने इस वर्ष के चुनाव के लिए सतीश बर्दीवार को अपना प्रत्याशी बनाया है। पार्टी ने उन्हें आबकारी मंत्री और विधान परिषद सदस्य आरबी तिम्मापुर के स्थान पर अपने टिकट से नवाजा है। इस निर्णय का तिम्मापुर के समर्थकों ने तीखा विरोध किया है। मुदहोल में इन समर्थकों ने तीन दिनों तक भारी शोर-शराबे के साथ विरोध-प्रदर्शन किया। इनका एक समूह कांग्रेस की सूची जारी होने के बाद पिछले हफ्ते बेंगलूरु भी जा पहुंचा। वहां कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) कार्यालय के सामने इन लोगों ने मुख्यमंत्री सिद्दरामैया के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की। मुदहोल नगर पालिका के उपाध्यक्ष कुबेर लमाणी ने कहा, ’’हम मुदहोल से तिम्मापुर को टिकट देने की मांग करते हैं। वह इस क्षेत्र के एक वरिष्ठ नेता हैं। वह हर समस्या में स्थानीय जनता के साथ ख़डे रहे हैं।’’ उल्लेखरनीय है कि मुदहोल विधानसभा क्षेत्र के १ लाख ९१ हजार मतदाताओं में से ३२ हजार मुस्लिम मतदाता हैं। यह समुदाय निश्चित रूप से इस वर्ष के चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकता है। दंगों की पी़डा ने इनके मन में सत्तासीन पार्टी के खिलाफ माहौल बना रखा है और जमीनी हालत को देखते हुए जनता दल (एस) के प्रत्याशी को इस समुदाय के समर्थन से अपनी जीत तय लगने लगी है। एक स्थानीय मतदाता और आईटी कर्मचारी एनएस रमेश का कहना है, ’’आम तौर पर पूरे कर्नाटक और खास तौर पर हमारे क्षेत्र के मुस्लिम मतदाता पारंपरिक रूप से जनता दल (एस) के समर्थक रहे हैं। इस पार्टी ने वर्ष १९९४ का चुनाव जीता था लेकिन कुमारस्वामी को वर्ष २००८ में भाजपा के सहयोग से राज्य के मुख्यमंत्री बनते हुए देखने के बाद यहां इस पार्टी का जनाधार काफी कमजोर हो चुका है।’’ रमेश का कहना है कि यहां हालात बदल रहे हैं और इस वर्ष फिर से जनता दल (एस) के पक्ष में माहौल बन रहा है। सो, इस बार यहां का चुनाव काफी दिलचस्प होने की उम्मीद है। बहरहाल, स्थानीय कांग्रेस पदाधिकारी अभय प्रसाद का दावा है कि कांग्रेस को यहां किसी प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना प़ड रहा है। इस प्रकार की बातें सिर्फ कोरी अफवाहगर्दी है, जो विपक्षी पार्टियों द्वारा फैलाई जा रही है। यह कोरी कल्पना से अधिक कुछ नहीं है। यह सच है कि हर बार के चुनाव में पार्टी के प्रत्याशियों में असंतोष की स्थिति उपजती है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कार्यकर्ता और पदाधिकारी बगावत का झंडा गा़डकर पार्टी को नुकसान पहुंचाने पर आमादा हो चुके हैं।

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